Skip to main content

पिंडदान, श्राद्ध आदि कर्म पुत्र द्वारा ही क्यों?

आज के इस लेख के माध्यम से आपको ज्ञान होगा कि पितृपक्ष में पुत्र द्वारा किए गए श्राद्ध से पितरों को प्रसन्न का क्यों होती है? पुत्र के द्वारा श्राद्ध किए जाने से क्या लाभ है?

पुत्र द्वारा ही श्राद्ध 

आधुनिक समय में लिंग भेद को नहीं माना जाता और हमारा भी यही मानना है कि पुत्र या पुत्री में कोई फर्क नहीं होता। पुत्र और पुत्री समान रूप से अपने परिवार और समाज के प्रेम के अधिकारी होते हैं। जिस प्रकार माता-पिता का संबंध उनके पुत्र से होता है ठीक उसी प्रकार पुत्री से भी प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होता है। 
संतान के विषय में लड़का और लड़की का कोई भेद नहीं होता और न ही होना चाहिए। फिर भी हमारे सनातन धर्म में हमारे शाश्त्र और वेद इस बात का प्रमाण देते है की पित्र पक्ष में श्राद्ध कर्म करने का पहला अधिकारी पुत्र ही होता है। 

इस्त्री में सेहेनशीलता का गन होता है तो पुरुष में बड़े से बड़े दुःख को सेहेन करने की अपार शक्ति होती है। यही कारण का की स्त्रियो का शमशान जाना भी वर्जित होता है। 
ईश्वर ने जो भी नियम बनाये उन सभी नियमो को शास्त्रों में समाहित कर दिया जिससे मनुष्य शास्त्रोक्त रीति से जीवन के प्रत्येक कर्म को पूर्ण निष्ठां के साथ कर सके। भगवान् श्री कृष्ण ने भी गीता में अर्जुन को समझाते हुवे कहा है की हे पार्थ,मनुष्य को कौन से कर्म करने चाहिए और कौन से कर्म नहीं करने चाहिए, इसका ज्ञान प्राणी को शास्त्रों की शरण में जाने से होगा क्युकी शास्त्र ही प्रमाण है उस नियम के जो ईश्वर ने बनाये और शास्त्रों में संकलित किये गए। 
आचार्य वसिष्ठ ने पुत्रवान् व्यक्ति की महिमा के संबंध में कहा है-
अपुत्रिण इत्यभिशापः ।
अर्थात् पुत्रहीनता एक प्रकार का अभिशाप है। 
और आगे भी बताया है-
पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । 
अब पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥
- वसिष्ठ स्मृति 17/5. 
अर्थात् पुत्र होने से पिता लोकों को जीत लेता है, पौत्र होने पर आनन्त्य को प्राप्त करता है और प्रपौत्र होने पर वह सूर्यलोक को प्राप्त कर लेता है। 
मनु महाराज का वचन है-
पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात् त्रायते पितरं सुतः । 
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ॥
अर्थात् 'पुं' नामक नरक से 'त्र' अर्थात् त्राण करने वाला 'पुत्र' कहा जाता है। ब्रह्मा ने लड़के को पुत्र कहा है। इसीलिए आस्तिकजन नरक से रक्षा की दृष्टि से पुत्र की इच्छा करते हैं। यही कारण है कि पिंडदान, श्राद्धादि कर्म करने का अधिकार पुत्र को प्रदान किया गया है।
शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि पुत्र वाले धर्मात्माओं की कभी दुर्गति नहीं होती। पुत्र का मुख देख लेने से पिता पितृऋण से मुक्त हो जाता है। पुत्र द्वारा प्राप्त श्राद्ध से मनुष्य स्वर्ग में जाता है। 'पूत' का अर्थ है-पूरा करना । त्र का अर्थ है-न किए से भी पिता की रक्षा करना। पिता अपने पुत्र द्वारा इस लोक में स्थित रहता है। धर्मराज यमराज के मतानुसार जिसके अनेक पुत्र हों, तो श्राद्ध आदि पितृ-कर्म तथा वैदिक (अग्निहोत्र आदि) कर्म ज्येष्ठ पुत्र के करने से ही सफल होता है। भाइयों को अलग-अलग पिंडदान, श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए-
'भ्रातरश्च पृथक् कुर्युर्नाविभक्ताः कदाचन ।'
श्राद्ध के अधिकार के संबंध में शास्त्रों में लिखा है कि पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र न हो, तो स्त्री श्राद्ध करे। पत्नी के अभाव में सहोदर भाई और उसके भी अभाव में जामाता एवं दौहित्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं।

सारांश

हम कह सकते है की पिंड दान , श्राद्ध कर्म करना मनुष्य का कर्त्तव्य है क्युकी बिना पिंड दान और श्राद्ध कर्म किये कोई भी मनुष्य कभी भी पितृ ऋण से मुक्त नहीं हो सकता। 
बिना श्राद्ध कर्म किये पितरो की कृपा भी कभी प्राप्त नहीं होती। पितृ हमारे पूर्वज होते है। उन्होंने ही हमे अपने परिवार में स्थान दिया था अतः अब उनके न होने पर वे जिस लोक में है वहां पर उनके भोजन की व्यवस्था बानी रहे ये जिम्मेदारी अब हमारी है। हम सभी को ज्ञात होना चाहिए की मनुष्यो का एक वर्ष पितृ लोक के १ दिन के बराबर होता है अर्थात जब हमारा एक वर्ष बीतता है तब पितरो का एक दिन पूरा होता है।

Comments

Popular posts from this blog

युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज का जीवन परिचय (Biography)

सनातन धर्म की पुनर्स्थापना और संतों की भूमिका सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। भारत की इस पावन भूमि पर समय-समय पर ऐसी महान विभूतियों ने जन्म लिया है जिन्होंने समाज को नई दिशा दी है। परमानन्द जी महाराज एक ऐसी ही मशाल हैं जिन्होंने अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया है। अध्याय 1: जन्म, बाल्यकाल और प्रारंभिक संस्कार (1935 - 1950) ​ विस्तृत विवरण: स्वामी जी का जन्म 26 अक्टूबर 1935 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक धर्मनिष्ठ परिवार में हुआ था। 30 के दशक का वह दौर भारत में वैचारिक क्रांति का दौर था। ​ पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनके परिवार के संस्कार और बचपन में देखे गए धार्मिक अनुष्ठानों का उन पर क्या प्रभाव पड़ा। ​ बाल्यकाल की अलौकिक घटनाएं: वे बचपन में अन्य बालकों से भिन्न कैसे थे? उनका झुकाव खेल-कूद के बजाय ध्यान और सत्संग की ओर कैसे बढ़ा? ​अध्याय 2: गुरु कृपा और सन्यास का संकल्प ​ चित्रकूट का आध्यात्मिक महत्व: जब हम परमानन्द जी महाराज के जीवन की बात करते हैं, तो स्वामी अखंडानंद जी महाराज का जिक्र अनिवार्य है। ​ प्रथम मिलन: चि...

कामघेनु : Gau Mata Ek Devi Ya Pashu | गाय के 108 नाम और उनकी महिमा

कामघेनु का स्वरुप  सनातन धर्म में पुरातन काल से ही गौ माता को विशेष स्थानीय विशेष दर्जा प्राप्त है।  गौ माता की उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि समुद्र मंथन से पूर्व भी गौ माता का अस्तित्व था या यूं कहें कि सृष्टि के प्रारंभ से ही गौ माता का अस्तित्व पुराणों में व्याप्त है।  संसार की उत्पत्ति भगवान शिव से होती है तो उसी समय गौ माता की उत्पत्ति भी होती है और तभी से गौ माता को एक झूठ बोलने के कारण भगवान शिव से श्राप मिला कि आने वाले कलयुग में उन्हें अपने मुख से संसार में जूठन खानी पड़ेगी परंतु शिव बहुत दयालु है।  अतः इस श्राप के साथ ही साथ उन्हें यह वरदान भी मिला कि उनमें 33 कोटि देवताओं का वास होगा। समस्त संसार में एक देवी के रूप में उनकी पूजा की जाएगी और समस्त संसार उनके सामने सदैव नतमस्तक रहेगा। कामधेनु सुरभि गौमाता संसार की समस्त गउवों की माता और जननी है। इनका निवास स्थान स्वर्ग में होने के कारण अत्यधिक पूजनीय मानी जाती हैं। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके प्रत्येक संस्कार में कहीं ना कहीं गाय का योगदान रहता है।  हम सभी...

Vishnu Shodasa Nama Stotram With Hindi Lyrics

विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् की उत्पत्ति   विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान विष्णु को समर्पित एक महामंत्र के रूप में जाना जाता है। सनातन धर्म में त्रिदेवो में भगवान श्री हरि विष्णु अर्थात भगवान नारायण एक विशेष स्थान रखते हैं। सभी प्राणियों को उनके कष्टों से मुक्ति पाने के लिए, उनकी इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् का  प्रतिदिन पाठ करना चाहिए।  विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान् श्री हरी के 16 नमो को मिलकर बनाया गया एक महामंत्र है जिकी शक्ति अतुलनीय है। जो साधक प्रतिदिन स्तोत्र का जाप करता है, भगवान श्री विष्णु उस साधक के चारों तरफ अपना सुरक्षा कवच बना देते हैं। उस सुरक्षा कवच के कारण साधक के भोजन से उसकी औषधियां तक भगवान की कृपा से ओतप्रोत हो जाती है और साधक भगवान के संरक्षण को प्राप्त करता है। अतः विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम को साधक को पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ जपना चाहिए क्योंकि नियमित रूप से साधक द्वारा पाठ करने से साधक के समस्त रोगो का नाश हो जाता है और साधक दीर्घायु को प्राप्त करता है।  Vishnu Shodasa Nama Sto...