Narsingh Kavach Mahima Stotra | संपूर्ण नरसिंह कवच स्तोत्र

नरसिंह कवच का संपूर्ण इतिहास

नमस्कार दोस्तों आज हम आप सभी के समक्ष नरसिंह कवच की महिमा को दर्शाएंगे। हम सभी ने कभी ना कभी नरसिंह कवच का नाम अवश्य सुना होगा परंतु नरसिंह कवच की महिमा उसके उच्चारण और उसके विषय में हम में से बहुत कम लोगों को ज्ञान है। चलिए शुरू करते हैं बोलिए भगवान नरसिंह की जय। 

आप सभी को बताते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि भगवान नरसिंह भगवान विष्णु के ही अवतारों में से एक अवतार हैं। भगवान विष्णु ने भगवान नरसिंह का अवतार कब धारण किया इसके लिए आप सभी को भक्त प्रहलाद की कथा को याद करना होगा।

भक्त पहलाद जिसके पिता एक राक्षस थे। इनका नाम का हिरण कश्यप। हिरण कश्यप भगवान विष्णु से बैर रखता था परंतु भगवान की कृपा के कारण हिरण कश्यप के पुत्र के रूप में स्वयं भगवान के भक्त ने जन्म लिया जिनका नाम आगे चलकर प्रहलाद रक्खा गया। प्रहलाद भगवान को अति प्रिय थे क्योंकि प्रह्लाद भी श्री हरी को अपना सर्वस्व मानते थे और सदैव श्री हरि का नाम का जाप किया करते थे। इसीलिए भगवान श्री हरि के भक्तों में प्रहलाद का नाम सर्वोपरि आता है और उन्हें भक्त प्रहलाद के नाम से जाना जाता है। 

प्रहलाद के पिता महाराज हिरणकश्यप ने अनेकों बार प्रह्लाद के प्राणों को हरने का प्रयास किया क्योंकि प्रहलाद सदैव श्री हरि के नाम का जाप किया करते थे और उनके पिता हिरण कश्यप चाहते थे कि प्रहलाद श्री हरि के नाम का जाप छोड़कर स्वयं अपने पिता के नाम का जाप करें परंतु पहलाद ने अपने पिता की एक न सुनी और वो बार बार कहते रहे कि संसार के कण कण में व्याप्त अगर कोई है तो केवल और केवल श्री हरी ही है और श्री हरी के अतिरिक्त और कोई भी संसार के कण-कण में व्याप्त नहीं वही।  श्री हरी ही आदि हैं और वही अनंत हैं। 

उनकी इन बातों से क्रुद्ध होकर उनके पिता हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को अनेको बार मारने का प्रयास किया परंतु प्रत्येक बार उनके हर प्रयास को श्रीमन्नारायण विफल कर देते। अन्तोगत्व भगवान् श्री हरी ने अपने भक्त के आवाहन पर प्रह्लाद के  प्राणों की रक्षा हेतु हिरण कश्यप के महल के खंभे में से अपने नरसिंह स्वरूप को प्रकट किया। नरसिंह भगवान ने अपने भक्त प्रहलाद के प्राणों की रक्षा के लिए उसके पिता हिरण कश्यप को अपने नाखूनों से मारकर उस दुष्ट आत्मा का अंत किया और अपने भक्त के प्राण की रक्षा की। 

भगवान के दर्शनों के बाद उनके स्नेह को प्राप्त करके भक्त प्रहलाद अति प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान की स्तुति करना प्रारंभ की। भक्त प्रहलाद ने भगवान नरसिंह की जो स्तुति की उसी स्तुति को आज हम सब नरसिंह कवच के रूप में जानते हैं।

 नरसिंह कवच की महिमा | Narsingh Kavach Ki Mahima

यह कवच अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इस स्तुति को करने से साधक जादू-टोना, भूत-पिशाच आदि के प्रभावों से मुक्त रहता है। नरसिंह कवच अत्यंत प्रभावशाली है। यह कवच अत्यंत चमत्कारी प्रभाव से ओतप्रोत है। जो साधक प्रतिदिन नरसिंह कवच का जाप करता है उसकी समस्त भौतिक इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं और उसे भगवान का सानिध्य प्राप्त होता है। 

भक्त प्रहलाद द्वारा निर्मित नरसिंह कवच साधक के आध्यात्मिक उन्नति करता है। उसे भय से मुक्त करके उसे जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। भगवान नरसिंह को समर्पित यह कवच साधक को शक्तिशाली बनाता है। प्रतिदिन साधक द्वारा नरसिंह कवच का जाप करने से उसकी कुंडली में उसके कर्मों के द्वारा जो बुरे योग बनते हैं, विभिन्न ग्रहों की बुरी दिशाओं के कारण जो कठिनाई साधक हो रही होती है, यह कवच साधक को ग्रहों के दुष्प्रभावों से मुक्त करने में उसकी मदद करता है। 

#नरसिंह कवच परम पवित्र माना जाता है क्योंकि यह अपने आप में स्वयं नारायण स्वरूप ही माना जाता है। समस्त बुरी बाधाओं का संपूर्ण रूप से विनाश करने में यह कवच सर्व सिद्ध सर्वमान्य है। नियमित रूप से इसका जाप करने से साधक सकारात्मक विचारों की ओर अग्रसर होता है। नकारात्मक विचारो से उसका पीछा छूट जाता है। साधक को भूत-प्रेत, पिशाच-निशाचर, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र आदि हानिकारक प्रभाव से मुक्ति मिल जाती है। आप सब को ज्ञात होना चाहिए की नर्सिंग कवच का वर्णन ब्रह्मानंद पुराण मिलता है। भगवन नारायण के नरसिंह अवतार में उनकी स्तुति के लिए भक्त प्रह्लाद ने इस कवच की रचना की थी।

|| श्री नृसिंह कवच | नरसिंह कवच || 

नृसिंह कवचम वक्ष्येऽ प्रह्लादनोदितं पुरा ।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनं ॥

सर्वसंपत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम । 
ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितं॥

विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिंदुसमप्रभं । 
लक्ष्म्यालिंगितवामांगम विभूतिभिरुपाश्रितं ॥

चतुर्भुजं कोमलांगम स्वर्णकुण्डलशोभितं । 
ऊरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितं ॥

तप्तकांचनसंकाशं पीतनिर्मलवासनं ।
इंद्रादिसुरमौलिस्थस्फुरन्माणिक्यदीप्तिभि: ॥

विराजितपदद्वंद्वं शंखचक्रादिहेतिभि:। 
गरुत्मता च विनयात स्तूयमानं मुदान्वितं ॥

स्वहृतकमलसंवासम कृत्वा तु कवचम पठेत
नृसिंहो मे शिर: पातु लोकरक्षात्मसंभव:।

सर्वगोऽपि स्तंभवास: फालं मे रक्षतु ध्वनन । 
नरसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचन: ॥

शृती मे पातु नरहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रिय: । 
नासां मे सिंहनासास्तु मुखं लक्ष्मिमुखप्रिय: ॥

सर्वविद्याधिप: पातु नृसिंहो रसनां मम । 
वक्त्रं पात्विंदुवदन: सदा प्रह्लादवंदित:॥

नृसिंह: पातु मे कण्ठं स्कंधौ भूभरणांतकृत । 
दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंह: पातु मे भुजौ ॥

करौ मे देववरदो नृसिंह: पातु सर्वत: । 
हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरि: ॥

मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्ष:कुक्षिविदारण: । 
नाभिं मे पातु नृहरि: स्वनाभिब्रह्मसंस्तुत: ॥

ब्रह्माण्डकोटय: कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिं । 
गुह्यं मे पातु गुह्यानां मंत्राणां गुह्यरुपधृत ॥
ऊरु मनोभव: पातु जानुनी नररूपधृत । 
जंघे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी ॥

सुरराज्यप्रद: पातु पादौ मे नृहरीश्वर: । 
सहस्रशीर्षा पुरुष: पातु मे सर्वशस्तनुं ॥

महोग्र: पूर्वत: पातु महावीराग्रजोऽग्नित:। 
महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालस्तु निर्रुतौ ॥

पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुख: । 
नृसिंह: पातु वायव्यां सौम्यां भूषणविग्रह: ॥

ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमंगलदायक: । 
संसारभयद: पातु मृत्यूर्मृत्युर्नृकेसरी ॥

इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमंडितं । 
भक्तिमान्य: पठेन्नित्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥

पुत्रवान धनवान लोके दीर्घायुर्उपजायते । 
यंयं कामयते कामं तंतं प्रप्नोत्यसंशयं॥

सर्वत्र जयवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत ।
 भुम्यंतरिक्षदिवानां ग्रहाणां विनिवारणं ॥

वृश्चिकोरगसंभूतविषापहरणं परं । 
ब्रह्मराक्षसयक्षाणां दूरोत्सारणकारणं ॥

भूर्जे वा तालपत्रे वा कवचं लिखितं शुभं । 
करमूले धृतं येन सिद्ध्येयु: कर्मसिद्धय: ॥

देवासुरमनुष्येशु स्वं स्वमेव जयं लभेत । 
एकसंध्यं त्रिसंध्यं वा य: पठेन्नियतो नर: ॥

सर्वमंगलमांगल्यंभुक्तिं मुक्तिं च विंदति ।
द्वात्रिंशतिसहस्राणि पाठाच्छुद्धात्मभिर्नृभि: । 

कवचस्यास्य मंत्रस्य मंत्रसिद्धि: प्रजायते। 
आनेन मंत्रराजेन कृत्वा भस्माभिमंत्रणम ॥

तिलकं बिभृयाद्यस्तु तस्य गृहभयं हरेत।
त्रिवारं जपमानस्तु दत्तं वार्यभिमंत्र्य च ॥

 प्राशयेद्यं नरं मंत्रं नृसिंहध्यानमाचरेत ।
तस्य रोगा: प्रणश्यंति ये च स्यु: कुक्षिसंभवा: ॥

किमत्र बहुनोक्तेन नृसिंहसदृशो भवेत । 
मनसा चिंतितं यस्तु स तच्चाऽप्नोत्यसंशयं ॥

गर्जंतं गर्जयंतं निजभुजपटलं स्फोटयंतं हरंतं दीप्यंतं तापयंतं दिवि भुवि दितिजं क्षेपयंतं रसंतं ।
कृंदंतं रोषयंतं दिशिदिशि सततं संभरंतं हरंतं । 
विक्षंतं घूर्णयंतं करनिकरशतैर्दिव्यसिंहं नमामि ॥

॥इति प्रह्लादप्रोक्तं नरसिंहकवचं संपूर्णंम ॥

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