महाभारत का युद्ध केवल अस्त्रों और शस्त्रों का खेल नहीं था, बल्कि यह ज्ञान, नीति और धर्म का एक महासागर था। जब गंगापुत्र भीष्म पितामह कुरुक्षेत्र की रणभूमि में शरशय्या (बाणों की शय्या) पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब उन्होंने पांडवों को जीवन के वह गूढ़ रहस्य बताए जो आज भी कलयुग के प्राणी के लिए 'अमृत' के समान हैं। विशेष रूप से, भीष्म पितामह ने अर्जुन को 'भोजन की शुद्धता' पर जो शिक्षा दी, वह हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है। ekadashi.org के इस विस्तृत लेख में, आइए जानते हैं कि भीष्म पितामह ने किन 4 प्रकार के भोजन को 'विष' और 'मदिरा' के समान बताकर उनका त्याग करने को कहा है। अन्न का आध्यात्मिक महत्व शास्त्रों में कहा गया है— "जैसा अन्न, वैसा मन" । अन्न साक्षात माता अन्नपूर्णा का स्वरूप है। हम जो भोजन ग्रहण करते हैं, वह केवल पेट नहीं भरता, बल्कि उससे हमारे विचारों का निर्माण होता है। भीष्म पितामह अर्जुन से कहते हैं कि हे कुंतीपुत्र! भोजन की शुद्धता से ही कर्म की शुद्धत...
Ekadashi Vrat Katha Mahatma
Discover the significance of Ekadashi, an important Hindu fasting day observed twice a month. Learn about its rituals, spiritual benefits, and cultural importance.