गुरु कृपा गुरु की कृपा और उनकी महिमा का वर्णन पुरातन काल से हमारे वेद और शास्त्रों में अनेकों जगहों वर्णित है। गुरु की महिमा का सहज वर्णन नहीं किया जा सकता। सहजोबाई एक साध्वी ने तो यहां तक कह डाला कि "गुरु न तजौ ,हरी हो ताज डारौ " अर्थात गुरु को मैं नहीं छोड़ सकती भले ही हरि को छोड़ना पड़े। इसीलिए गुरु को कृपा का सागर अर्थ गुरु कृपा सागर कहते है। गुरु को मैं नहीं छोड़ सकता हरी को छोड़ सकता हूं क्योंकि हरी सदा साथ रहा और उसने मेरा कोई भी काम नहीं किया। हरि तो सदा से था। वह करता पुरुष ,अकाल पुरुष ,परमपिता तो सदा से था परंतु उसने हमारा क्या किया। इसलिए कहा गया है "हरी ने जन्म मरण दियो साथ " अर्थात हरि ने तो जन्म और मरण दिया ,हरि के कारण ही सारा बंधन और दुख हुआ ,जो भोगना पड़ा परंतु गुरु ने कृपा करके मुझे छुड़ा लिया ,बंधन मुक्त कर दिया ,गुरु ने भाव बंधन से छुटकारा दिलाया और मेरे स्वरूप का बोध कराया। गुरु का काम बंधन मुक्त करना है। गुरु की महिमा का गान करते हुए अन्य गुरुवो ने भी कहा "गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपन...
एकादशी व्रत कथा माहात्म्य (ekadashi.org) पर आपका स्वागत है। यह मंच केवल एकादशी व्रत की तिथियों और कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ आपको वेदों, पुराणों और प्राचीन भारतीय इतिहास का दिव्य संगम मिलेगा। हम आपके लिए लाए हैं सनातन धर्म का वह गूढ़ ज्ञान और पौराणिक रहस्य जो आपकी आध्यात्मिक यात्रा को समृद्ध करेंगे। प्रामाणिक वैदिक सूत्रों और ऐतिहासिक तथ्यों के साथ ईश्वरीय ज्ञान को सरल हिंदी में समझने के लिए हमसे जुड़ें। अपनी संस्कृति और धर्म की जड़ों से गहराई से जुड़ने का एक वैश्विक केंद्र।