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Showing posts from April, 2020

Prakriti -Swami Parmanand Ji Maharaj | प्रकृति - स्वामी परमानन्द जी महाराज

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प्रकृति प्रतिक्षण बदल रही है। आने वाला पल अगले ही पल में बीता हुआ पल कहलाता है। यह संसार भी  प्रति पल-पल बदल रहा है क्योंकि यह संसार प्रकृति के अधीन है। समस्त सृष्टि इस प्रकृति की गोद से ही उत्पन्न हुई है। इसलिए हम सभी को प्रकृति का सम्मान करना चाहिए और प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।  प्रकृति ने हमें जितने भी प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराएं हैं हमें उन प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग कभी नहीं करना चाहिए अर्थात प्रकृति से हमें केवल उतना ही लेना चाहिए जितना हमारी आवश्यकता के अनुसार हो।  पेड़ों की लकड़ियों के अलावा प्रकृति हमें बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन प्रदान करती है जिसमें तेल, खनिज, धातु इत्यादि अलग प्रकार की वस्तुएं हैं। यह प्रकृति ही है जो हमें सांस लेने के लिए शुद्ध वायु प्रदान करती है पर क्या प्रकृति द्वारा प्राप्त समस्त संसाधनों का हमने सदुपयोग किया ? ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हम सबके पास है पर हममे से कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देना नहीं चाहता।  आज के भौतिक समाज की सत्यता केवल इतनी है की हमे जिससे जो चाहिए बस वो हमें प्राप्त हो जाये लेकिन

सत्य दर्शन क्या होता है Satya Darshan Kya Hota Hai | Swami Parmanand Ji Maharaj

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सत्य का दर्शन हम सभी ने सदगुरुदेव Swami Parmanand Ji Maharaj के आशीर्वचनो में किया है। गुरुदेव ने वेदांत व्याख्या के माध्यम से हम सभी को सत्य के दर्शन कराने का प्रयास किया है। हम सभी लोग जब किसी से वार्तालाप करते हैं तो किसी न किसी बात पर सत्य और असत्य अवश्य बोलते हैं। हम उसी को सत्य मान लेते है जो दिखता है परन्तु सत्य वो होता है जो दिखता ही नहीं। असत्य को सत्य समझने की भूल आज सारी मानव जाती कर रही है।   जब हम कोई सत्कर्म करते है तब आपके मन में उनके प्रति कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होता की क्या आपने जो किया वह सही था या गलत। जैसे मंदिर के यदि दानपात्र में ₹1 डाला जाए तो उस एक रुपए के प्रति किसी के मन में कभी कोई शंका उत्पन्न नहीं होगी की ₹1 मंदिर के दानपात्र में डालकर हम ने सही किया या गलत। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी अंतरात्मा जानती है कि हमने इस एक रुपए को किसी धर्म स्वरूप कार्य में लगाया है इसलिए हमारे मन में कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होता है।  जब प्राणी कोई गलत कर्म करता है तो जीवात्मा स्वरुप परमेश्वर हमे सचेत करने के लिए हमारे मन में प्रश्न बनकर उत्पन्न हो प्रकट ह