परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा 2026 | जलझूलनी एकादशी कथा, महत्व और पूजा विधि

॥ अथ वामन (परिवर्तिनी) एकादशी माहात्म्य ॥

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की परम पावन जलझूलनी एकादशी का पूर्ण विधान, कथा एवं आध्यात्मिक महत्व

प्रिय सनातन धर्मावलंबियों एवं एकादशी व्रत के साधकों! हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि अत्यंत मंगलकारी, पवित्र एवं सर्वपापहारिणी मानी गई है। शास्त्रों में इस पावन एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी, वामन एकादशी, पार्श्व एकादशी तथा जयंती एकादशी जैसे अनेक दिव्य नामों से संबोधित किया गया है। सनातन परंपरा और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के चार महीनों में जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन रहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस विशेष तिथि को योगनिद्रा में शयन करते हुए भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं। भगवान के स्थान/करवट बदलने (परिवर्तन) के कारण ही इस पुण्यप्रद एकादशी को 'परिवर्तिनी एकादशी' कहा गया है।

इसके अतिरिक्त, भारतवर्ष के कई सांस्कृतिक क्षेत्रों विशेषकर राजस्थान, गुजरात और उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में इस दिन भगवान विष्णु या उनके बाल रूप (श्रीकृष्ण) की डोली यात्रा निकाली जाती है और उन्हें जलाशय, सरोवर या नदी के किनारे ले जाकर जल में स्नान अथवा नौका विहार कराया जाता है। इसी कारण लोक भाषा में इसे 'जलझूलनी एकादशी' अथवा 'डोल ग्यारस' के नाम से भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। पौराणिक ग्रन्थों का कथन है कि जो मनुष्य इस दिन श्रद्धा एवं नियमपूर्वक भगवान वामन तथा श्रीहरि विष्णु की आराधना करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान अनंत गुना पुण्य फल प्राप्त होता है।


परिवर्तिनी (जलझूलनी) एकादशी 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त एवं पारण समय

वर्ष 2026 में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की यह एकादशी तिथि अत्यंत दुर्लभ और शुभ योगों के साथ आ रही है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब तिथि का चयन शुद्ध रूप से सूर्योदय व्यापिनी तिथि के आधार पर किया जाए तथा पारण शास्त्रसम्मत द्वादशी तिथि के शुभ समय पर संपन्न हो।

विवरण (Panchang Details) तिथि एवं समय (Date & Time)
एकादशी व्रत तिथि 22 सितंबर 2026, मंगलवार
एकादशी तिथि प्रारंभ 21 सितंबर 2026 को दोपहर 03:45 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त 22 सितंबर 2026 को दोपहर 05:20 बजे तक
व्रत पारण का शुभ समय (Dvadashi Parana) 23 सितंबर 2026 को प्रात: 06:12 AM से 08:35 AM तक
मुख्य पूज्य देव श्री वामन देव (विष्णु अवतार) एवं श्री राधा-कृष्ण

* विशेष: सूर्योदय और अक्षांश के अंतर के कारण स्थानीय पंचांगों में समय में सूक्ष्म अंतर हो सकता है। अतः अपने स्थानीय पुरोहित या पंचांग से भी पारण समय का मिलान अवश्य करें।

परिवर्तिनी (वामन) एकादशी की पौराणिक व्रत कथा

यह पौराणिक कथा पद्म पुराण एवं ब्रह्मांड पुराण में विस्तारपूर्वक वर्णित है। महाभारत काल में जब धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ वनवास भोग रहे थे, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया—

धर्मराज युधिष्ठिर बोले: "हे जगन्नाथ! हे मधुसूदन! कृपा करके मुझे यह बताइए कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? इसकी पूजन विधि क्या है और इसके पालन से किस फल की प्राप्ति होती है? कृपा कर मेरे संशय का निवारण करें।"

भगवान श्री मधुसूदन (श्रीकृष्ण) मुस्कुराते हुए बोले: "हे कुंतीपुत्र राजश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम अत्यंत धर्मनिष्ठ हो। अब मैं तुम्हें भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की उस परम पावन एकादशी की कथा सुनाता हूँ, जिसके केवल श्रवण मात्र से ही मनुष्य के जन्मांतरों के समस्त पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं। इस एकादशी को 'जयंती एकादशी' या 'परिवर्तिनी एकादशी' कहा जाता है।"

श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित वामन अवतार कथा

भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं— "हे पार्थ! त्रेतायुग में बलि नाम का एक पराक्रमी दैत्यराज हुआ। वह यद्यपि असुर कुल में जन्मा था, परंतु अत्यंत धर्मपरायण, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त और भगवान विष्णु का परम उपासक था। वह अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करता था और अपनी दानशीलता के लिए समस्त तीनों लोकों में विख्यात था। उसने अपनी कठिन तपस्या और महान यज्ञों के बल से देवेंद्र इंद्र को पराजित कर तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।"

"जब देवराज इंद्र और अन्य समस्त देवता अपना अधिकार और स्वर्गलोक खोकर वनों में भटकने लगे, तब वे अत्यंत दुःखी होकर मेरे पास (क्षीरसागर में) आए। देवताओं ने वेद-मंत्रों से मेरी स्तुति की और रक्षा की गुहार लगाई। देवताओं के कष्ट निवारण और सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए मैंने अदिति और महर्षि कश्यप के आश्रम में 'वामन' (बौने ब्राह्मण बालक) के रूप में पाँचवाँ अवतार ग्रहण किया।"

राजा बलि के यज्ञ में वामन देव का आगमन:
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— "वामन रूप धारण करके मैं हाथ में छत्र, दंड और कमंडल लेकर राजा बलि के अश्वमेध यज्ञ स्थल पर पहुँचा। अत्यंत तेजस्वी और दिव्य बालक वामन को देखकर राजा बलि अत्यंत प्रसन्न हुए और उनका भव्य स्वागत किया। बलि ने वामन देव से कहा— 'हे ब्रह्मचारी! आपके आगमन से मेरा यज्ञ सफल हुआ। आप जो भी चाहें— स्वर्ण, भूमि, ग्राम, हाथी, घोडे़ या वस्त्र— मुझसे दान में माँग सकते हैं।'"

"तब वामन देव ने राजा बलि से मंद मुस्कान के साथ कहा— 'हे दैत्यराज! मुझे धन-संपदा या विशाल राज्य की आवश्यकता नहीं है। यदि आप मुझे दान देना ही चाहते हैं, तो केवल अपने पैरों के माप से तीन पग भूमि दान में दे दीजिए।' राजा बलि यह सुनकर हँस पड़े और बोले— 'हे बटुक! आप बालक हैं, आपकी बुद्धि अभी अपरिपक्व है। मुझसे माँगना ही था तो पूरा राज्य माँगते! लेकिन यदि आपकी इच्छा तीन पग भूमि ही है, तो मैं संकल्प लेता हूँ।'"

दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने भगवान की लीला को तुरंत पहचान लिया और राजा बलि को चेतावनी दी— "हे बलि! यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं जगतपति भगवान विष्णु हैं जो देवताओं का कार्य सिद्ध करने आए हैं। इन्हें दान देने का संकल्प मत लो, अन्यथा तुम्हारा सब कुछ छीन जाएगा।" परंतु दानवीर बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे और उन्होंने कहा— "यदि स्वयं जगदीश्वर मेरे द्वार पर याचक बनकर आए हैं, तो मेरा सर्वस्व न्योछावर होना भी मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।" बलि ने अपने हाथ में जल लेकर संकल्प कर दिया।

भगवान का त्रिविक्रम विराट रूप और बलि का सर्वस्व समर्पण

संकल्प पूरा होते ही वामन रूपधारी भगवान ने अपना अत्यंत विशाल 'त्रिविक्रम' (विराट) रूप प्रकट किया।

  • भगवान ने अपने प्रथम पग में संपूर्ण भूलोक (पृथ्वी), नदियाँ और पर्वत माप लिए।
  • अपने दूसरे पग में उन्होंने भुवर्लोक, स्वर्गलोक, नक्षत्र मंडल और संपूर्ण अंतरिक्ष को नाप लिया।

भगवान के दो ही पगों में समस्त ब्रह्मांड समाहित हो गया। इसके बाद भगवान विष्णु का नाभि-कमल सत्यलोक तक पहुँच गया। तब भगवान ने राजा बलि से पूछा— "हे बलि! मैंने दो ही पगों में संपूर्ण ब्रह्मांड नाप लिया है। अब बताओ, मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ? यदि तुम अपना वचन पूरा नहीं कर सके, तो तुम्हें असत्यवादी होने का पाप लगेगा।"

राजा बलि ने अत्यंत नम्रता और भक्ति से अपना सिर नीचा किया और बोले— "हे प्रभु! संपत्ति से बड़ा उसका स्वामी होता है। आपने मेरे राज्य को तो नाप लिया, परंतु मुझे अभी नहीं नापा है। कृपा करके अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।"

भगवान विष्णु बलि की इस निष्काम एवं अनन्य भक्ति तथा सत्यनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना तीसरा चरण राजा बलि के मस्तक पर रख दिया, जिससे राजा बलि सुतल (पाताल) लोक में चले गए। भगवान ने बलि से कहा— "हे बलि! तुम्हारी सत्यवादिता से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम सुतल लोक का राज्य संभालो, वहाँ तुम्हें स्वर्ग से भी अधिक वैभव प्राप्त होगा। और तुम्हारी भक्ति के वशीभूत होकर मैं सदैव तुम्हारे द्वार पर गदाधर रूप में पहरेदार बनकर निवास करूँगा।"

करवट बदलने और परिवर्तिनी नामकरण का रहस्य:
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया— "हे राजन्! राजा बलि के भक्ति-पाश में बँधकर मेरा एक रूप (वामन/गदाधर) सुतल लोक में राजा बलि के द्वार पर स्थित रहता है, तथा मेरा दूसरा स्वरूप क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में रहता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस एकादशी तिथि को ही मैं क्षीरसागर में शयन करते हुए दाईं से बाईं करवट लेता हूँ। इसी कारण इस तिथि को 'परिवर्तिनी एकादशी' कहते हैं। जो मनुष्य इस दिन मेरी वामन मूर्ति की पूजा करता है, उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों की एक साथ आराधना का फल प्राप्त होता है।"


परिवर्तिनी एकादशी का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व

हिन्दू धर्मग्रंथों में परिवर्तिनी एकादशी को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। चातुर्मास के दौरान आने वाली यह एकादशी आध्यात्मिक साधना और आत्म-शुद्धि का सर्वोत्तम अवसर प्रदान करती है।

१. वाजपेय यज्ञ का पुण्य

शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति परिवर्तिनी एकादशी का निश्छल भाव से व्रत रखता है, उसे सौ वाजपेय यज्ञ तथा अश्वमेध यज्ञ करने के समान महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

२. समस्त महापापों का क्षय

अज्ञानवश या जाने-अनजाने में हुए बड़े से बड़े पाप भी इस एकादशी का व्रत करने और भगवान वामन की कथा सुनने मात्र से नष्ट हो जाते हैं।

३. त्रिदेवों की कृपा

भगवान विष्णु के वामन रूप में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का अंश समाहित है। इस दिन वामन पूजन से तीनों देवों का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है।

४. मोक्ष एवं वैकुंठ प्राप्ति

जो साधक सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर भगवद्धाम पाना चाहते हैं, उनके लिए परिवर्तिनी एकादशी परम गति प्रदान करने वाली मानी गई है।

परिवर्तिनी एकादशी की संपूर्ण पूजन विधि

एकादशी व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात्रि से ही प्रारंभ हो जाता है। यदि आप भी इस पावन एकादशी का पूर्ण लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, तो निम्नलिखित पूजन विधि का पालन करें:

  1. दशमी तिथि के नियम: दशमी तिथि की संध्या को सात्विक भोजन ग्रहण करें। सूर्यास्त के पश्चात भोजन न करें और रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। मसूर की दाल, प्याज, लहसुन और चावल का त्याग करें।
  2. प्रातःकाल स्नान एवं संकल्प: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त हों। किसी पवित्र नदी, सरोवर अथवा घर पर ही स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ (पीले या श्वेत) वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान सूर्य के समक्ष व्रत का संकल्प लें:
    "हे भगवान श्रीहरि विष्णु/वामन देव! मैं आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी का निर्जला/फलाहारी व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूँ। मेरा यह व्रत निष्विघ्न पूर्ण हो।"
  3. पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर को स्वच्छ करें। एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु, श्री वामन देव या लड्डू गोपाल की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
  4. षोडशोपचार पूजन:
    • भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं।
    • तत्पश्चात शुद्ध जल से स्नान कराकर पीले वस्त्र पहनाएं।
    • भगवान को पीले चंदन, रोली, अक्षत, पीले पुष्प, और तुलसी दल अर्पित करें (ध्यान रहे, तुलसी दल बिना विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है)।
    • धूप और दीप (गाय के शुद्ध देशी घी का दीपक) प्रज्वलित करें।
  5. विशेष भोग: भगवान वामन को दही, चावल (पूजा के उपयोग हेतु), मक्खन, मिश्री, मौसमी फल (जैसे केला, सेब) और घर में बनी बेसन या खोये की मिठाई का भोग लगाएं। भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य रखें।
  6. कथा पाठ एवं मन्त्र जप: भगवान के समक्ष बैठकर परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें अथवा सुनें। इसके बाद 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ॐ श्री वामनाय नमः' मंत्र का कम से कम १०८ बार (एक माला) जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत उत्तम माना गया है।
  7. आरती एवं क्षमा प्रार्थना: पूजन के अंत में कपूर से भगवान विष्णु और माँलक्ष्मी की आरती उतारें। पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें।
  8. रात्रि जागरण: एकादशी की रात्रि को सोना नहीं चाहिए। संभव हो तो रात्रि में भगवान के नाम का भजन-कीर्तन या श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करते हुए जागरण करें।

जलझूलनी एकादशी (डोल ग्यारस) की विशेष परंपराएं

परिवर्तिनी एकादशी को राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत में 'जलझूलनी एकादशी' अथवा 'डोल ग्यारस' के रूप में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन निम्नलिखित विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं:

  • भगवान की शोभायात्रा (डोल यात्रा): इस दिन मंदिरों से बाल गोपाल (श्रीकृष्ण) या विष्णु जी की अष्टधातु/पीतल की मूर्तियों को सुंदर ढंग से सजाए गए सुसज्जित विमानों (डोली या रथ) में विराजमान किया जाता है। ढोल-नगाड़ों और कीर्तन-मंजिरों के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।
  • जल विहार एवं नौका विहार: शोभायात्रा किसी पवित्र नदी, तालाब या सरोवर के तट पर पहुँचती है। वहाँ विधि-विधान से भगवान की प्रतिमा को जल से स्नान कराया जाता है तथा नौका में बैठाकर जल विहार (नौका विहार) कराया जाता है। इसे ही 'जल में झुलाना' कहा जाता है।
  • नूतन वस्त्र एवं शृंगार: स्नान के पश्चात प्रभु को नए वस्त्र (आभूषण) धारण कराए जाते हैं और पुनः गाजे-बाजे के साथ मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालुओं में विशेष महाप्रсад (पंजीरी, पंचामृत) वितरित किया जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी पर दान एवं पारण की सही विधि

१. एकादशी पर दान का विशेष महत्व

परिवर्तिनी एकादशी के दिन दान करने का विशेष शास्त्रोक्त विधान है। वामन भगवान ब्राह्मण रूप में आए थे, इसलिए इस दिन योग्य ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को दान देने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

  • दही और चावल का दान: इस दिन दही, चावल और शक्कर (चाँदी की वस्तु के साथ) का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि वामन भगवान को दही-चावल अत्यंत प्रिय हैं।
  • वस्त्र एवं छाता दान: वामन अवतार के प्रतीक स्वरूप ब्राह्मणों को कमंडल, छाता (छत्र), जूते, पीला वस्त्र और फल दान करना चाहिए।
  • अन्न एवं तिल दान: किसी निर्धन व्यक्ति को अनाज, तिल, या गुड़ का दान करने से घर में अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती।

२. द्वादशी पारण (व्रत खोलने) के नियम

एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि के भीतर शुभ मुहूर्त में ही किया जाना आवश्यक है। पारण के बिना एकादशी का व्रत अधूरा माना जाता है।

  • समय का ध्यान रखें: २३ सितंबर २०२६ को प्रातः सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व पारण करें। हरिवासर (द्वादशी की पहली एक-चौथाई अवधि) के दौरान पारण कभी न करें।
  • पारण की प्रक्रिया: प्रात:काल स्नान करके पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें। किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं या दान-दक्षिणा निकालें।
  • पारण का भोजन: सबसे पहले तुलसी दल और गंगाजल ग्रहण करके व्रत खोलें। तत्पश्चात सात्विक भोजन (जैसे चावल, मूंग की दाल) ग्रहण करें। इस दिन भी तामसिक भोजन से पूरी तरह दूर रहें।

एकादशी व्रत में क्या करें और क्या न करें (नियम एवं सावधानियां)

क्या करें (Do's):

  • दिनभर मन में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का निरंतर मानसिक जाप करते रहें।
  • सत्य बोलें, बड़ों का सम्मान करें और मन में दया भावना रखें।
  • यदि स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार (दूध, फल, मखाना, सेंधा नमक) लेकर व्रत रखें।
  • घर के वातावरण को शुद्ध रखने के लिए लोबान या धूप जलाएं।
  • एकादशी के दिन पीपल और तुलसी के पौधे की परिक्रमा करें (परंतु रविवार/एकादशी को तुलसी पत्र न तोड़े)।

क्या न करें (Don'ts):

  • चावल का सेवन न करें: एकादशी के दिन चावल खाना शास्त्रों में महापाप माना गया है (मान्यता है कि इस दिन चावल खाने से महर्षि मेधा के अंश का भक्षण होता है)।
  • बाल, दाढ़ी या नाखून न काटें तथा साबुन/तेल का प्रयोग कम से कम करें।
  • क्रोध, निंदा, चुगली, असत्य भाषण और किसी का अपमान करने से बचें।
  • तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा) का पूर्णतः त्याग करें।
  • एकादशी के दिन तुलसी का पत्ता न तोड़ें (पूजा हेतु एक दिन पूर्व ही तोड़ कर रख लें)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

प्रश्न १: परिवर्तिनी एकादशी को 'जलझूलनी' या 'डोल ग्यारस' क्यों कहते हैं?

उत्तर: इस दिन भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को सुंदर डोली (डोल) में विराजमान करके जलाशय या सरोवर के पास ले जाया जाता है और जल में स्नान कराकर नौका विहार कराया (झुलाया) जाता है। इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी या डोल ग्यारस कहा जाता है।

प्रश्न २: इस दिन भगवान के किस स्वरूप की मुख्य रूप से पूजा की जाती है?

उत्तर: इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। साथ ही कई स्थानों पर श्रीराधा-कृष्ण और लड्डू गोपाल जी का भी विशेष शृंगार एवं पूजन किया जाता है।

प्रश्न ३: एकादशी व्रत के दौरान क्या-क्या खाया जा सकता है?

उत्तर: एकादशी का व्रत निर्जला या फलाहारी रखा जाता है। फलाहार में आप ताजा फल, दूध, दही, मखाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना और सेंधा नमक से बनी चीजें ग्रहण कर सकते हैं। अनाज, दालें, सामान्य नमक, हल्दी और तले-भुने भोजन का सेवन वर्जित है।

प्रश्न ४: क्या गर्भवती महिलाएं या बीमार व्यक्ति यह व्रत रख सकते हैं?

उत्तर: गर्भवती महिलाओं, वृद्धों और अस्वस्थ व्यक्तियों के लिए कठिन व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। वे केवल मानसिक रूप से भगवान का ध्यान कर सकते हैं, सात्विक भोजन (बिना चावल) ग्रहण कर सकते हैं और कथा सुन सकते हैं। भक्ति में भाव प्रधान होता है, शरीर को कष्ट देना आवश्यक नहीं है।

प्रश्न ५: परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा सुनने का क्या फल प्राप्त होता है?

उत्तर: पद्म पुराण के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी की कथा सुनने या पढ़ने मात्र से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है और उसके जन्मांतर के पाप नष्ट होकर अंत समय में वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।

प्रश्न ६: चातुर्मास में परिवर्तिनी एकादशी का विशेष आध्यात्मिक महत्व क्यों है?

उत्तर: चातुर्मास में भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में रहते हैं। इस तिथि को वे करवट बदलते हैं। यह 'करवट' ब्रह्मांडीय और आध्यात्मिक ऊर्जा में सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। अतः इस दिन की गई पूजा-साधना शीघ्र फलदायी होती है।

प्रामाणिक धर्मग्रंथ एवं संदर्भ स्रोत (Authentic References):

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