मौनी अमावस्या 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और दान का फल
मौनी अमावस्या 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और दान का फल
हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मौनी अमावस्या (Mauni Amavasya) कहा जाता है। इसे 'माघ अमावस्या' के नाम से भी जाना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन मौन रहकर आत्म-साक्षात्कार करने और पवित्र नदियों में स्नान करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
मौनी अमावस्या 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
साल 2026 में मौनी अमावस्या की तिथि को लेकर विशेष संयोग बन रहे हैं।
विवरण |
तिथि और समय |
|---|---|
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अमावस्या तिथि प्रारंभ |
17 जनवरी 2026, रात से |
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अमावस्या तिथि समाप्त |
18 जनवरी 2026, शाम तक |
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मुख्य स्नान पर्व |
18 जनवरी 2026 (रविवार) |
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ब्रह्म मुहूर्त स्नान |
सुबह 05:25 से 06:15 तक |
मौनी अमावस्या का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माघ के महीने में देवलोक के समस्त देवी-देवता प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर निवास करते हैं।
- अमृत तत्व की प्राप्ति: कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत कलश निकला, तो उसकी कुछ बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक की नदियों में गिरी थीं। अमावस्या के दिन इन नदियों का जल अमृत के समान हो जाता है।
- मौन व्रत की महिमा: इस दिन 'मौन' रहने का विशेष विधान है। ऋषि मनु का जन्म भी इसी दिन माना जाता है, इसलिए 'मनु' शब्द से ही 'मौनी' की उत्पत्ति हुई है।
- पितृ दोष से मुक्ति: यह दिन पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
मौनी अमावस्या पर क्या करें? (पूजा विधि)
यदि आप घर पर या किसी पवित्र नदी के तट पर हैं, तो निम्नलिखित विधि अपनाएं:
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: सूर्योदय से पूर्व स्नान करना उत्तम है। यदि गंगा जी जाना संभव न हो, तो घर में नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- मौन व्रत का संकल्प: स्नान के बाद मौन रहने का संकल्प लें। यदि पूरा दिन संभव न हो, तो कम से कम सवा घंटे या पूजा के समय तक मौन अवश्य रहें।
- भगवान विष्णु की पूजा: भगवान विष्णु (पीतांबर धारी) की पूजा करें। उन्हें पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें।
- सूर्य अर्घ्य: तांबे के पात्र में जल, तिल और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
दान का विशेष महत्व
मौनी अमावस्या पर किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन इन वस्तुओं का दान जरूर करें:
- तिल और गुड़: सर्दियों का समय होने के कारण तिल-गुड़ का दान स्वास्थ्य और पुण्य दोनों के लिए अच्छा है।
- ऊनी वस्त्र: गरीबों को कंबल या गर्म कपड़े दान करें।
- अन्न दान: चावल, दाल या आटा किसी मंदिर या जरूरतमंद को दें।
- गाय की सेवा: इस दिन गाय को हरा चारा खिलाने से पितृ प्रसन्न होते हैं।
- इस दिन किसी से वाद-विवाद न करें और न ही झूठ बोलें।
- तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) का त्याग करें।
- देर सुबह तक न सोएं, क्योंकि माघ मास में जल्दी जागने का विशेष महत्व है।
- ऊर्जा का संरक्षण: बोलने में हमारी बहुत अधिक मानसिक ऊर्जा व्यय होती है। एक दिन का मौन हमारे मस्तिष्क को विश्राम देता है और आंतरिक ऊर्जा को संचित करता है।
- आत्म-चिंतन: जब हम बाहरी जगत से संवाद बंद करते हैं, तब हम अपने अंतर्मन की आवाज सुन पाते हैं। यह दिन आत्म-निरीक्षण (Self-introspection) के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
- वाणी दोष का निवारण: अनजाने में बोले गए कटु वचन या झूठ के पापों से मुक्ति के लिए मौन व्रत एक प्रायश्चित की तरह कार्य करता है।
- तिल तर्पण: हाथ में काले तिल और जल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण करें और जल अर्पित करें।
- गीता पाठ: इस दिन श्रीमद्भगवद गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- दीपदान: शाम के समय घर के ईशान कोण में या पीपल के वृक्ष के नीचे शुद्ध घी का दीपक जलाएं। इससे पितृ प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
- इसे 'अमृत योग' माना जाता है क्योंकि ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि गंगा जल में औषधीय गुण चरम पर होते हैं।
- श्रद्धालु इस दिन प्रयागराज में 'कल्पवास' की पूर्णता की ओर बढ़ते हैं।
- मान्यता है कि इस दिन संगम में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है।
विशेष टिप: मौनी अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करना वैवाहिक जीवन और आर्थिक उन्नति के लिए लाभकारी माना जाता है।
क्या न करें?
मौनी अमावस्या और मौन का मनोविज्ञान
अध्यात्म में 'मौन' को वाणी की तपस्या माना गया है। मौनी अमावस्या के दिन चुप रहने का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व इस प्रकार है:
पितृ दोष शांति के लिए विशेष उपायचूंकि अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित है, इसलिए मौनी अमावस्या पर पितृ शांति के लिए निम्नलिखित कार्य अवश्य करें:
पौराणिक कथा: क्यों खास है यह दिन?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कांचनपुरी के ब्राह्मण देवस्वामी की कथा मौनी अमावस्या से जुड़ी है।
कथा के अनुसार, जब देवस्वामी की पुत्री के विवाह में बाधाएं आ रही थीं, तब एक ज्योतिषी ने उसे 'सोमा धोबिन' की सेवा करने की सलाह दी। सोमा ने मौनी अमावस्या के दिन अपने पुण्य का फल ब्राह्मण की पुत्री को दान किया, जिससे उसका वैवाहिक जीवन सुखी हुआ। तब से यह मान्यता है कि इस दिन व्रत और दान करने से अखंड सौभाग्य और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
प्रयागराज कुंभ और माघ मेला का संबंध
मौनी अमावस्या 'माघ मेले' और 'कुंभ' (यदि उस वर्ष हो) का सबसे बड़ा स्नान पर्व होता है।
राशि अनुसार दान (Short Table)
यदि पाठक अपनी राशि के अनुसार दान करना चाहें, तो यह सूची लाभकारी होगी:
राशि
क्या दान करें
मेष व वृश्चिक
गुड़ और मसूर की दाल
वृषभ व तुला
मिश्री, चावल या सफेद वस्त्र
मिथुन व कन्या
हरी मूंग की दाल या चारा
कर्क
दूध या चांदी की वस्तु
सिंह
गेहूं या तांबे का बर्तन
धनु व मीन
चने की दाल, हल्दी या पीली मिठाई
मकर व कुंभ
काला तिल, छाता या कंबल
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या मौनी अमावस्या पर उपवास रखना अनिवार्य है?
उत्तर: अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि संभव हो तो फलाहार व्रत रखना मानसिक और शारीरिक शुद्धि के लिए उत्तम है।
प्रश्न 2: यदि गंगा स्नान संभव न हो तो क्या करें?
उत्तर: अपने नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें, यह भी समान पुण्य फल देता है।
प्रश्न 3: मौन व्रत कब से कब तक रखना चाहिए?
उत्तर: आदर्श रूप से सूर्योदय से सूर्यास्त तक मौन रहना चाहिए, अन्यथा पूजा के समापन तक मौन अवश्य रखें।
निष्कर्ष
सनातन धर्म मौनी अमावस्या केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन को शांत करने और आत्मा को शुद्ध करने का अवसर है। संयम, सेवा और समर्पण के साथ इस दिन को मनाने से जीवन में सकारात्मकता आती है।


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