Skip to main content

परमानंद जी महाराज ने बताया मन्त्र जाप कैसे करें

हिंदू धर्म में मंत्र जाप का बहुत महत्व है। शास्त्रों के मुताबिक, मंत्र का जाप करने से पहले और बाद में कुछ नियमों का पालन करना चाहिए।

साधकः- मन्त्र जाप कैसे करें? मन्त्र का अर्थ बतायें। 

महाराजश्रीः- कोई भी मन्त्र हो लगातार उसे श्वास के साथ बोलें। मान लो नमः शिवाय। क्योंकि जो कोई मन्त्र लिया होता है, उस मन्त्र को बताने के लिए गुरु मना कर देते हैं। तो मान लो "नमः शिवाय"। कई बार मेरा श्वास लेते में नमः शिवाय, नमः शिवाय..... (अनन्तबार) हो गया। ऐसे ही श्वास निकालते में हो गया।
और दूसरा होता है, दो भागों में, जैसे-राम-सीता, राधे-श्याम, सोऽहम्, जो दो भागों में बँटता है। आधा मन्त्र श्वास लेते में आधा मन्त्र श्वास निकालते में बोलते हैं। बोलते नहीं बल्कि केवल स्मरण करते हैं। जो जुबान या माला से करते हैं, वह जाप है, जो श्वास से करते हैं, वह अजपा है। केवल स्मरण, बोलना नहीं है। केवल शब्द का सुमिरन करना है।
ऐसे ही लोग 'सोऽहम्' का अर्थ पूछते हैं। सोऽहम् का अर्थ समझना है। जब तक हम सोऽहम् का अजपा जाप करते हैं, तब तक यह योग साधना है। और जब सोऽहम् का अर्थ क्या है? तब यह ज्ञान है। यह दोनों में चलता है। उपासना में कोई अर्थ जाने या न जाने। मन्त्रों का अभ्यास हो गया, मन एकाग्रचित होगा, पवित्र होगा, भाव मिलेगा, मन अच्छा बन जायेगा।
पर राम क्या है? अब यह समझना है। राम व्यापक है कि एक देशीय है? सब में एक। यह क्या है? और वह दिखता है, कि देखता है? या फिर वह रहस्य है? इसी तरह सोऽहम् में सो और अहम् है। तत्त्वमसि महावाक्य में तत् और त्वम् है। तत् माने ईश्वर, त्वम्, माने-जीव। ऐसे ही जिज्ञासा" जीवन रहस्य की कुंजी सोऽहम् में स अहम्, वह और मैं। ये दो हैं कि एक है? 'मैं' क्यों है और वो 'वह' क्यों कहलाता है, जबकि सब में व्यापक है। उसको समझना है और समझकर फिर चिन्तन करना है।
'सोऽहम्' या अन्य मन्त्र, उपासना और ज्ञान दोनों में काम आते हैं। उपासना की दृष्टि से ध्यान, भजन करना चाहिए, एकाग्र होना चाहिए, प्रसन्न होना चाहिए। उनकी याद में मन को गद्गद् होना चाहिए। ये उपासना है। और तब भी यदि लगे कि अच्छा तो बहुत लगता है पर हमें 'राम' नहीं मिले, अच्छा तो बहुत लगता है, पर हम 'ब्रह्म' से एक नहीं हुए। सोऽहम् करते-करते ब्रह्म से कोई एक थोड़े हो जाता है। समझ ही नहीं आयेगा। सिर्फ अपने-अपने मत का आग्रह है।
तो सः क्या है? अहम् क्या है? 'वह' क्या चीज है और 'मैं' क्या चीज ? उन दोनों (वह और मैं) में सत्य क्या है?
नोट-इसको गहराई पर इसलिए नहीं ले जाता कि जिन्होंने प्रक्रिया का अध्ययन नहीं किया है, उन्हें थोड़ी कठिनाई होगी।
इसी प्रकरण से सम्बन्धित एक प्रसंग-कई लोग गुरु बदलते रहते हैं। मेरे से भी पूछते हैं कि-

दुबारा (मन्त्र) ले सकते हैं या नहीं? 

तो हमने कहा कि ये तो मुझे पता है कि यदि तुम सफल हो जाते तो दुबारा की बात ही नहीं करते। लेकिन क्या तुम मेरा (मन्त्र) लेकर, सफल हो जाओगे? कोई गारण्टी है क्या? फिर तुम्हें तीसरा (गुरु) चाहिए, फिर चौथा.... तो गुरु बदलने की आदत अच्छी नहीं है। पर कोई सचमुच साधक है, समझ नहीं आती, तो किसी गुरु की सहायता लेना कोई अपराध नहीं है। हमारी समझ में, हमारे शिष्य किसी से पूछ सकते हैं। किसी के शिष्य मेरे से पूछ लें, तो उचित मार्ग दर्शन करना गलत नहीं है।, कोई हमारा सोचना यह तो नहीं है कि एक दूसरे की दुकान में धक्का देना है। अरे! उनके शिष्य रहकर मुझसे यदि कुछ पूछ जाओगे तो क्या कोई नुकसान हो जायेगा?
लेकिन प्रायः लोग क्या करते हैं, दूसरे के शिष्यों को यह कहकर कि ऐसा करो कि वहाँ मन्त्र ले लो। तो ये मुझे तो अच्छा नहीं लगता। जहाँ मैं बदल लेने के विरोध में नहीं हूँ, वहाँ बार-बार बदल लेने से भी, कहीं निष्ठा ही नहीं बन पायेगी। इसलिए मैं गुरु बदलने के पक्ष में नहीं हूँ। पर आवश्यकता है, तो जो कर रहे हो, उसी में हम सहायता करेंगे। उन्हीं को गुरु मानकर श्रद्धापूर्वक अभ्यास करो। यदि और आगे की बात करो तो 'गुरु' कोई देह होता ही नहीं; न मैं गुरु, न वह गुरु, न कोई गुरु। 'गुरु' तो वही विद्या है; उसको प्राप्त करो। वही गुरु है और सब 'देह' हैं।

Comments

Popular posts from this blog

युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज का जीवन परिचय (Biography)

सनातन धर्म की पुनर्स्थापना और संतों की भूमिका सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। भारत की इस पावन भूमि पर समय-समय पर ऐसी महान विभूतियों ने जन्म लिया है जिन्होंने समाज को नई दिशा दी है। परमानन्द जी महाराज एक ऐसी ही मशाल हैं जिन्होंने अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया है। अध्याय 1: जन्म, बाल्यकाल और प्रारंभिक संस्कार (1935 - 1950) ​ विस्तृत विवरण: स्वामी जी का जन्म 26 अक्टूबर 1935 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक धर्मनिष्ठ परिवार में हुआ था। 30 के दशक का वह दौर भारत में वैचारिक क्रांति का दौर था। ​ पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनके परिवार के संस्कार और बचपन में देखे गए धार्मिक अनुष्ठानों का उन पर क्या प्रभाव पड़ा। ​ बाल्यकाल की अलौकिक घटनाएं: वे बचपन में अन्य बालकों से भिन्न कैसे थे? उनका झुकाव खेल-कूद के बजाय ध्यान और सत्संग की ओर कैसे बढ़ा? ​अध्याय 2: गुरु कृपा और सन्यास का संकल्प ​ चित्रकूट का आध्यात्मिक महत्व: जब हम परमानन्द जी महाराज के जीवन की बात करते हैं, तो स्वामी अखंडानंद जी महाराज का जिक्र अनिवार्य है। ​ प्रथम मिलन: चि...

कामघेनु : Gau Mata Ek Devi Ya Pashu | गाय के 108 नाम और उनकी महिमा

कामघेनु का स्वरुप  सनातन धर्म में पुरातन काल से ही गौ माता को विशेष स्थानीय विशेष दर्जा प्राप्त है।  गौ माता की उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि समुद्र मंथन से पूर्व भी गौ माता का अस्तित्व था या यूं कहें कि सृष्टि के प्रारंभ से ही गौ माता का अस्तित्व पुराणों में व्याप्त है।  संसार की उत्पत्ति भगवान शिव से होती है तो उसी समय गौ माता की उत्पत्ति भी होती है और तभी से गौ माता को एक झूठ बोलने के कारण भगवान शिव से श्राप मिला कि आने वाले कलयुग में उन्हें अपने मुख से संसार में जूठन खानी पड़ेगी परंतु शिव बहुत दयालु है।  अतः इस श्राप के साथ ही साथ उन्हें यह वरदान भी मिला कि उनमें 33 कोटि देवताओं का वास होगा। समस्त संसार में एक देवी के रूप में उनकी पूजा की जाएगी और समस्त संसार उनके सामने सदैव नतमस्तक रहेगा। कामधेनु सुरभि गौमाता संसार की समस्त गउवों की माता और जननी है। इनका निवास स्थान स्वर्ग में होने के कारण अत्यधिक पूजनीय मानी जाती हैं। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके प्रत्येक संस्कार में कहीं ना कहीं गाय का योगदान रहता है।  हम सभी...

Vishnu Shodasa Nama Stotram With Hindi Lyrics

विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् की उत्पत्ति   विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान विष्णु को समर्पित एक महामंत्र के रूप में जाना जाता है। सनातन धर्म में त्रिदेवो में भगवान श्री हरि विष्णु अर्थात भगवान नारायण एक विशेष स्थान रखते हैं। सभी प्राणियों को उनके कष्टों से मुक्ति पाने के लिए, उनकी इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् का  प्रतिदिन पाठ करना चाहिए।  विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान् श्री हरी के 16 नमो को मिलकर बनाया गया एक महामंत्र है जिकी शक्ति अतुलनीय है। जो साधक प्रतिदिन स्तोत्र का जाप करता है, भगवान श्री विष्णु उस साधक के चारों तरफ अपना सुरक्षा कवच बना देते हैं। उस सुरक्षा कवच के कारण साधक के भोजन से उसकी औषधियां तक भगवान की कृपा से ओतप्रोत हो जाती है और साधक भगवान के संरक्षण को प्राप्त करता है। अतः विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम को साधक को पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ जपना चाहिए क्योंकि नियमित रूप से साधक द्वारा पाठ करने से साधक के समस्त रोगो का नाश हो जाता है और साधक दीर्घायु को प्राप्त करता है।  Vishnu Shodasa Nama Sto...