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Basant Panchami: क्यों मनाई जाती है बसंत पंचमी? जानें सरस्वती पूजा की विधि, महत्व और पौराणिक कथा

बसंत पंचमी (Basant Panchami) का त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसे 'ऋतुराज बसंत' के आगमन का प्रतीक और ज्ञान की देवी मां सरस्वती का जन्मोत्सव माना जाता है। ​इस लेख में हम जानेंगे कि बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है, इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है और इस दिन की पूजा विधि क्या है। ​ बसंत पंचमी का धार्मिक और पौराणिक महत्व ​धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब ब्रह्मांड की रचना की, तो उन्हें सब कुछ शांत और मौन लगा। जीव-जंतु और मनुष्य सभी मूक थे। इस सन्नाटे को दूर करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। ​उनके हाथों में वीणा, पुस्तक और माला थी। ​जैसे ही देवी ने वीणा का तार छेड़ा, समस्त संसार को वाणी मिल गई। ​नदियों में कल-कल की ध्वनि, पक्षियों में चहचहाहट और मनुष्यों में बोलने की शक्ति आ गई। ​चूंकि यह घटना माघ शुक्ल पंचमी को हुई थी, इसलिए इस दिन को सरस्वती जयंती या बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाने लगा। ​ मां सरस्वत...

अयप्पा भगवान की दीक्षा - सबरीमाला

स्वामियों अय्यापो
स्वामी अय्यप्पा को दक्षिण भारत, खासकर केरल और तमिलनाडु में बहुत पूजा जाता है।
स्वामी अय्यप्पा को एक योगी और नायक के रूप में जाना जाता है। वे ब्रह्मचर्य, वीरता और ज्ञान के देवता माने जाते हैं।
स्वामी अय्यप्पा के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर है, जो केरल के पश्चिमी घाटों में स्थित है।
हर साल लाखों श्रद्धालु सबरीमला की कठिन यात्रा करते हैं, जिसे 'अय्यप्पा व्रत' कहा जाता है।
यहाँ स्वामी अय्यप्पा से जुड़ी कुछ रोचक बातें हैं:
 * उनका जन्म पंचमी तिथि को हुआ था, इसलिए उन्हें 'पंचमी शिव' भी कहा जाता है।
 * उन्हें 'हरिहरपुत्र' भी कहा जाता है क्योंकि वे भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों के पुत्र हैं।
 * उन्हें 'अय्यप्पन' नाम इसलिए मिला क्योंकि वे 'अय्य' (पिता) और 'पप्पन' (बच्चा) दोनों हैं।
 * उन्हें 'शास्त्री' भी कहा जाता है क्योंकि वे ज्ञान के देवता हैं।
स्वामी अय्यप्पा के भक्त उन पर बहुत श्रद्धा रखते हैं और उनसे जीवन में सफलता और मोक्ष प्राप्ति की कामना करते हैं।
अयप्पा भगवान की दीक्षा Ayyappa Bhagwan Ki Diksha 
अयप्पा दीक्षा, दक्षिण भारत की एक परंपरा है। इसे केरल के सबरीमाला मंदिर जाने से पहले भगवान अयप्पा के भक्तों को 41 दिनों तक पालन करना होता है। इस दौरान भक्तों को ये नियम पालन करने होते हैं:
*काले कपड़े पहनना
*दाढ़ी-बाल नहीं कटवाना
*नंगे पैर रहना
*नॉनवेज नहीं खाना
*जमीन पर सोना
*ब्रह्मचर्य का पालन करना
*बुराई और प्रलोभनों से बचने के लिए हमेशा अपने साथ तुलसी का पत्ता रखना
*भगवान का भजन करना 
इस दौरान भक्तों को रिश्तों के मोह को छोड़कर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। इस दौरान भक्तों को बिना लहसुन/प्याज के केवल सात्विक भोजन करना होता है। जहाँ भी जाते हैं नंगे पैर चलते हैं। इस दौरान भक्तों को न तो किसी परफ्यूम का इस्तेमाल करना होता है और न ही शराब का सेवन।
अयप्पा दीक्षा को 'मंगलम' कहा जाता है। अयप्पा स्वामी को भगवान शिव और मोहिनी (भगवान विष्णु का रूप) का पुत्र माना गया है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण किया तब शिव जी उनपर मोहित हो गए और उनका वीर्यपात हो गया। इसके प्रभाव से स्वामी अयप्पा का जन्म हुआ। इसलिए अयप्पा देव को हरिहरन भी कहा जाता है। अय्यपा हिंदू देवता हैं। वे विकास के देवता माने जाते हैं और केरल में विशेष रूप से पूज्य हैं।
अयप्पा स्वामी किसके देवता है?
भगवान अयप्पा को सत्य और धार्मिकता का हिंदू देवता माना जाता है। उन्हें धर्मसस्थ और मणिकंदन के नाम से भी जाना जाता है। कुछ पुराणों में अयप्पा स्वामी को शास्ता का अवतार माना जाता है। अयप्पा की पूजा सबसे अधिक दक्षिण भारत में होती है। हालांकि इनके मंदिर देश के कई स्थानों पर हैं जो दक्षिण भारतीय शैली में ही निर्मित होते हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला।

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