Skip to main content

नवरात्रि प्रथम दिवस माता शैलपुत्री पूजन | नव दुर्गा का प्रथम स्वरूप माता शैलपुत्री

Navdurga-Pratham-Swaroop-Mata-Shailputri

नमस्कार मित्रों, नवरात्रि के प्रथम दिवस में आप सभी का स्वागत है। नवरात्रि माता आदिशक्ति को समर्पित उनके नौ स्वरूपों का दिन माना जाता है। नवरात्र के 9 दिन में माता आदिशक्ति के नौ रूपों की पूजा पूर्ण विधि विधान के साथ की जाती है।  शक्ति स्वरूपणी  माता आदिशक्ति का प्रथम स्वरूप जिसे हम माता शैलपुत्री के रूप में जानते हैं उन्हीं की उपासना नवरात्रि के पहले दिवस पर की जाती है अर्थात नवरात्रि के प्रथम दिवस की देवी माता शैलपुत्री मानी जाती हैं। 

माता शैलपुत्री हिमालय राज की पुत्री हैं। इसीलिए इनका नाम शैल पड़ा है। माता शैलपुत्री ने ही अपने पूर्व जन्म में सती के रूप में प्रजापति दक्ष के यहां उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया था। उस जन्म में उनके पिता प्रजापति दक्ष द्वारा शिव का अपमान किए जाने पर माता सती ने आत्मदाह कर लिया था। वही माता सती अपने अगले जन्म में शैलपुत्री के रूप में जन्मी और उनके पिता हिमालय राज हुए। 

माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है। माता अपने एक हाथ में त्रिशूल तो दूसरे हाथ में कमल को धारण किए हुए हैं। माता के स्वरूप की बात करें तो माता का दिव्य स्वरूप इतना मनमोहक है जिसका वर्णन संसार की कोई भी वाणी सहजता के साथ नहीं कर सकती।

 माता का स्वरूप गौर वर्ण का है इसलिए माता को सफेद रंग अत्यंत प्रिय है। यही कारण है कि माता को भोग लगाने वाली सामग्रियों में भी सफेद रंग के पुष्प, सफेद रंग के मिष्ठान इत्यादि को भेंट किया जाता है। माता की पूजा करते समय भी साधक को चाहिए कि वह सफेद रंग के वस्त्र धारण करके माता की पूजा करें। इससे माता प्रसन्न होती है क्योंकि सफेद रंग माता को प्रिय होने के साथ ही साथ साधक द्वारा पूजा करने पर सफेद रंग की प्रिय वस्तुओं को भेंट चढ़ाने और सफेद रंग के वस्त्रों को धारण करके पूजा करने से माता सम्मोहित होती है और साधक पर अपनी कृपा करती हैं। माता शैलपुत्री नव दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। माता शैलपुत्री शुभता कि सूचक और सौभाग्य को देने वाली है। 

माता शैलपुत्री का निवास मूलाधार चक्र में माना जाता है। यदि प्राणी अपने मूलाधार चक्र को जागृत कर लेता है तो उसका अर्थ यह होता है कि उसने माता शैलपुत्री की शक्ति को अपने शरीर में जागृत कर लिया है और यदि शैलपुत्री शरीर में जागृत हो जाती है तो शनै-शनै ब्रह्मांड की समस्त सकारात्मक ऊर्जा शरीर में उत्पन्न होने लगते हैं और व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास होना प्रारंभ हो जाता है। 

शरीर में मूलाधार चक्र के स्वरूप में माता शैलपुत्री के जागृत होने से साधक को मन की स्थिरता प्राप्त होती है। फिर उसका मन भटकना बंद कर देता है। माता शैलपुत्री ने अपने पूर्व जन्म में माता सती के रूप में असहनीय कष्ट को सहा था। पूर्व जन्म के पिता प्रजापति दक्ष के अपराध के कारण उन्होंने स्वयं आत्मदाह करके अपने पिता के के अपराधों के लिए स्वयं को दंडित किया था। वही माता सती अपने अगले जन्म में हिमालय राज के यहां जब पुत्री रूप में जन्मी तो उनके दिव्य विग्रह के दर्शन करके उनका नाम शैलपुत्री रखा गया। 

माता आदिशक्ति के इस स्वरूप की पूजा करने से मनुष्य का धर्म, अर्थ, बल तीव्रता के साथ बढ़ने लगता है। उसकी इच्छा शक्ति प्रबल हो जाती है और उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। यदि साधक पूर्ण श्रद्धा से योग के माध्यम से अपने मूलाधार चक्र को जागृत करने का प्रयास करें तो उसका मूलाधार चक्र जागृत हो सकता है। 

मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी माता शैलपुत्री को ही माना जाता है। मूलाधार चक्र के जाग्रत होने का मतलब है कि माता शैलपुत्री की दिव्य शक्तियों का शरीर में प्रवेश हो जाना और जब माता शैलपुत्री कि शक्तियां शरीर में प्रवेश हो जाती हैं तो मूलाधार चक्र से लेकर स्वाधिष्ठान चक्र तक और स्वाधिष्ठान चक्र से लेकर सहस्त्रार चक्र तक साधक को दिव्य अनुभव होने लगता हैं। 

माता शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र के द्वारा माता की आराधना करनी चाहिए:

"  ॐ  या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, 

नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमो नमः "

इस मंत्र के द्वारा माता को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए। माता को धूप, दीप, नैवेद्य का भोग लगाएं। माता को जो भी मिष्ठान का भोग लगाएं तो सदैव ही प्रयास करना चाहिए कि वह सफेद रंग का हो और माता से अपने और अपने कुल के कल्याण के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। 

Popular Post-Swami Parmanand Ji Maharaj Ka Jivan Parichay 

Comments

Popular posts from this blog

युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज का जीवन परिचय (Biography)

सनातन धर्म की पुनर्स्थापना और संतों की भूमिका सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। भारत की इस पावन भूमि पर समय-समय पर ऐसी महान विभूतियों ने जन्म लिया है जिन्होंने समाज को नई दिशा दी है। परमानन्द जी महाराज एक ऐसी ही मशाल हैं जिन्होंने अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया है। अध्याय 1: जन्म, बाल्यकाल और प्रारंभिक संस्कार (1935 - 1950) ​ विस्तृत विवरण: स्वामी जी का जन्म 26 अक्टूबर 1935 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक धर्मनिष्ठ परिवार में हुआ था। 30 के दशक का वह दौर भारत में वैचारिक क्रांति का दौर था। ​ पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनके परिवार के संस्कार और बचपन में देखे गए धार्मिक अनुष्ठानों का उन पर क्या प्रभाव पड़ा। ​ बाल्यकाल की अलौकिक घटनाएं: वे बचपन में अन्य बालकों से भिन्न कैसे थे? उनका झुकाव खेल-कूद के बजाय ध्यान और सत्संग की ओर कैसे बढ़ा? ​अध्याय 2: गुरु कृपा और सन्यास का संकल्प ​ चित्रकूट का आध्यात्मिक महत्व: जब हम परमानन्द जी महाराज के जीवन की बात करते हैं, तो स्वामी अखंडानंद जी महाराज का जिक्र अनिवार्य है। ​ प्रथम मिलन: चि...

कामघेनु : Gau Mata Ek Devi Ya Pashu | गाय के 108 नाम और उनकी महिमा

कामघेनु का स्वरुप  सनातन धर्म में पुरातन काल से ही गौ माता को विशेष स्थानीय विशेष दर्जा प्राप्त है।  गौ माता की उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि समुद्र मंथन से पूर्व भी गौ माता का अस्तित्व था या यूं कहें कि सृष्टि के प्रारंभ से ही गौ माता का अस्तित्व पुराणों में व्याप्त है।  संसार की उत्पत्ति भगवान शिव से होती है तो उसी समय गौ माता की उत्पत्ति भी होती है और तभी से गौ माता को एक झूठ बोलने के कारण भगवान शिव से श्राप मिला कि आने वाले कलयुग में उन्हें अपने मुख से संसार में जूठन खानी पड़ेगी परंतु शिव बहुत दयालु है।  अतः इस श्राप के साथ ही साथ उन्हें यह वरदान भी मिला कि उनमें 33 कोटि देवताओं का वास होगा। समस्त संसार में एक देवी के रूप में उनकी पूजा की जाएगी और समस्त संसार उनके सामने सदैव नतमस्तक रहेगा। कामधेनु सुरभि गौमाता संसार की समस्त गउवों की माता और जननी है। इनका निवास स्थान स्वर्ग में होने के कारण अत्यधिक पूजनीय मानी जाती हैं। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके प्रत्येक संस्कार में कहीं ना कहीं गाय का योगदान रहता है।  हम सभी...

Vishnu Shodasa Nama Stotram With Hindi Lyrics

विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् की उत्पत्ति   विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान विष्णु को समर्पित एक महामंत्र के रूप में जाना जाता है। सनातन धर्म में त्रिदेवो में भगवान श्री हरि विष्णु अर्थात भगवान नारायण एक विशेष स्थान रखते हैं। सभी प्राणियों को उनके कष्टों से मुक्ति पाने के लिए, उनकी इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् का  प्रतिदिन पाठ करना चाहिए।  विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान् श्री हरी के 16 नमो को मिलकर बनाया गया एक महामंत्र है जिकी शक्ति अतुलनीय है। जो साधक प्रतिदिन स्तोत्र का जाप करता है, भगवान श्री विष्णु उस साधक के चारों तरफ अपना सुरक्षा कवच बना देते हैं। उस सुरक्षा कवच के कारण साधक के भोजन से उसकी औषधियां तक भगवान की कृपा से ओतप्रोत हो जाती है और साधक भगवान के संरक्षण को प्राप्त करता है। अतः विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम को साधक को पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ जपना चाहिए क्योंकि नियमित रूप से साधक द्वारा पाठ करने से साधक के समस्त रोगो का नाश हो जाता है और साधक दीर्घायु को प्राप्त करता है।  Vishnu Shodasa Nama Sto...