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देवरहा बाबा की जीवनी? | देवरहा बाबा का जीवन परिचय

देवरहा बाबा का जन्म स्थान 

आज हम आप सभी के समक्ष एक ऐसे संत की जीवनी लेकर आए हैं जो अपने आप में एक चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी थे। जिनके जन्म के विषय में किसी को भी संपूर्ण ज्ञान नहीं कि उनका जन्म कब कहां और किस अवस्था में हुआ था। उनके विषय में जो कथाएं प्रचलित हैं, जो साधारण जनमानस जानता है, वह यह है कि उनका जन्म भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के देवरिया जिले में हुआ था। 

क्या देवरहा बाबा की आयु 250 वर्ष थी? | 

क्या देवरहा बाबा की आयु 500 वर्ष थी? | 

क्या देवरहा बाबा की आयु 900 वर्ष थी?

मुख्य रूप से देवरहा बाबा देवरिया में रहने के कारण प्रसिद्ध हुए और देवरिया में इस महान संत की उत्पत्ति के कारण ही इनका नाम देवरहा बाबा हुआ। विभिन्न संतो के विचारों के अनुसार उन पर लिखित किताबों के अनुसार यह बात स्पष्ट होती है कि देवरहा बाबा अपने संपूर्ण जीवन में एक लंबी आयु प्राप्त करने के पश्चात ही उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया। कोई उनकी आयु 200 साल के लगभग बताता है, तो कोई संत उनकी आयु 500 साल, तो कोई 900 साल भी बताते हैं परंतु उनके जन्म के विषय में किसी को भी ठीक-ठीक है पर उनके चमत्कारों की चर्चा आज भी होती रहती है। 

देवरहा बाबा जीवन पर्यंत अपने अनुयायियों के आने वाले कष्टों को दूर करने के लिए तरह-तरह के चमत्कार दिखाते थे जिसके कारण उनकी ख्याति दिन-ब-दिन बढ़ती गई। उनकी ख्याति इस कदर बढ़ चुकी थी कि भारत के राज्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत का नेतृत्व करने वाले प्रधान नेता राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तक उनके दर्शनों की इच्छा रखते हुए उनके दर्शनों को आते थे। 

देवरहा बाबा क्या खाते थे?

देवरहा बाबा एक दिव्य संत थे। उनकी उपस्थिति साधारण जनमानस के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थी। बिना कुछ खाए अपने संपूर्ण जीवन को यूं ही भक्तों के कल्याण के लिए बिता देना केवल एक महान संत की पहचान कराता है। जितने भी संतों ने आज तक देवरहा बाबा के विषय में अपनी वाणी से कुछ कहा है, वह सभी एक ही बात प्रमुखता से कहते हैं कि देवरहा बाबा ने अपने संपूर्ण जीवन में अन्न का एक दाना भी नहीं खाया अपने संपूर्ण जीवन काल में देवरहा बाबा केवल यमुना के पानी पर ही निर्भर थे अर्थात् वे यमुना नदी का पानी अर्थात यमुना के जल को ही आहार के रूप में ग्रहण करते थे और कभी-कभी भक्तों द्वारा लाये हुवे दूध, शहद, या श्रीफल के रास को ग्रहण करते थे परंतु अपने संपूर्ण जीवन काल में उन्होंने कभी भी अन्न नहीं खाया और एक लंबी आयु प्राप्त की। 

देवरहा बाबा का आश्रम 

देवरहा बाबा के आश्रम की चर्चा लगातार होती रही है। अगर मुख्य रूप से जाने तो देवरहा बाबा का आश्रम उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में सरयू नदी के किनारे स्थित है परंतु अपने संपूर्ण जीवन में देवराहा बाबा ने अपने कर्म भूमि मथुरा में यमुना नदी के किनारे स्थित स्थान को बनाया। 
कहा जाता है की यमुना नदी के किनारे लकड़ियों के मचान पर ही बाबा निवास करते थे और वहीं से अपने भक्तों को दर्शन देकर उनका कल्याण करते थे। किसी भक्त पर जब बाबा प्रसन्न हो जाते थे तो मचान से ही अपने पैरों को लटका के उस भक्तों के सर पर अपने पैर को रख उसे अपना आशीर्वाद दे देते थे। 

देवरहा बाबा की लम्बी आयु का रहस्य क्या है ?

देवरहा बाबा प्रारंभ से ही आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर रहें। उन्होंने प्रारंभ से ही ध्यान और योग के माध्यम से इतनी आध्यात्मिक और प्राकृतिक ऊर्जा को अपने शरीर में संचित कर लिया की उन्हें कभी भी अन्न खाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। 
देवरहा बाबा एक असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी थे। इसे कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी की देवरहा बाबा कोई साधारण मानव नहीं बल्कि एक महापुरुष थे जिन्होंने संसार में जन्म लेकर अनेक भक्तों का कल्याण किया और निरंतर ध्यान और योग की विभिन्न क्रियाओ को करते करते अपने शरीर को सिद्ध करते हुए एक लम्बी आयु प्राप्त की। 

देवरहा बाबा की सिद्धि 

देवरहा बाबा को मन की गति से आने जाने की सिद्धि प्राप्त थी। यही कारण है कि देवरहा बाबा एक समय में 1 से अधिक स्थानों पर प्रकट हो जाया करते थे। उनके विषय में उनके भक्तों द्वारा जो बातें कही गई उनमें यहां तक बोला गया कि जब कोई भक्त बाबा के दर्शनों के लिए आता था तो बाबा अपने भक्तों को प्रसाद अवश्य देते थे और प्रसाद में बाबा सदैव फल या सूखे मेवे अपने भक्तों में बांट दिया करते थे। 
यह फल और सूखे मेवे बाबा को कोई देता नहीं था बल्कि जिस मचान पर बाबा निवास करते थे उसी मचान पर एक खाली स्थान में जब बाबा अपना हाथ करते तो बाबा के हाथ में चमत्कारिक रूप से वह फल और सूखे मेवे प्रकट हो जाते थे जिन्हें बाबा प्रसाद के रूप में अपने भक्तों में बांट दिया करते थे। 
इस प्रकार यह बात सिद्ध होती है कि देवरहा बाबा एक ईश्वरी अवतारी पुरुष थे जिनके दर्शन से समस्त मानव जाति लाभान्वित होती रही। 

कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न

कांग्रेस पार्टी की विजय की आधारशिला रखने का श्रेय भी देवरहा बाबा को ही जाता है। वर्ष 1980 से पहले कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह कुछ और था परंतु वर्ष 1980 के बाद से कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा हो गया। इसके पीछे प्रमुख कारण था देवरहा बाबा का आशीर्वाद। 
कहा जाता है कि 1980 के चुनाव से पूर्व इंदिरा गांधी स्वयं देवरहा बाबा के दर्शन करने पहुंची और जब उन्होंने बाबा के दर्शन किए तो बाबा ने अपना हाथ उठाकर उन्हें अपना आशीर्वाद दिया जिस कारण उन्हें बाबा का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और बाबा के दर्शन से लौटकर इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव चिन्ह को बाबा के हाथ का पंजा ही बना दिया और हाथ के पंजे के रूप में कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह प्रतिष्ठित हो गया। यही कारन है की 1980 के चुनाव में इंदिरा गाँधी ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की और वे देश की प्रधानमंत्रीं बन गयी।

देवरहा बाबा के वैश्विक ख्याति

देवरहा बाबा की वैश्विक ख्याति इस कदर बढ़ चुकी थी कि उनसे मिलने और उनके दर्शन करने हैं भारत के ही नहीं बल्कि दूसरे देशों से भी लोग आया करते थे। उस समय के प्रसिद्द व्यक्ति श्री पुरुषोत्तम दास टंडन, डॉ राजेंद्र प्रसाद और मदन मोहन मालवीय जैसे महापुरुष बाबा के दर्शनों के लिए आया करते थे। 
इतना ही नहीं सन 1911 में जॉर्ज पंचम भी बाबा के दर्शनों के लिए आए थे और उन्होंने बाबा के दर्शन कर उनसे काफी देर तक बात करके अपने हृदय की समस्त बातें बाबा के सामने रखी और बाबा का आशीर्वाद प्राप्त किया। 

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