दशरथ महल: अयोध्या के पलटू बनिए की कहानी | Ayodhya Puri Ke Paltu Baniye Ki Kahani

अयोध्या पूरी 

नमस्कार मित्रों आज हम आप सभी के समक्ष भगवान श्री राम की पुरी  अयोध्या पुरी कि एक ऐसी विचित्र कथा को लेकर आए हैं जिसे सुनने के बाद आप आत्म विभोर हो जाएंगे। इस कथा को सुनने के पश्चात आपको यह आभास होगा कि भगवान श्री राम अयोध्या के कण-कण में वास करते हैं। अपने भक्तों के हृदय में वास करते हैं और उन्हें अपने छोटे से छोटे भक्तों की चिंता सदैव घेरे रहती है। 
इसलिए अपने भगवान श्रीराम पर हम सभी को पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए क्योंकि भगवान के घर देर अवश्य है पर अंधेर नहीं है अर्थात भगवान श्री राम अपने हर भक्त पर अपनी कृपा अवश्य बरसाते हैं। 

कथा 

भगवान श्री राम अयोध्या आज अपने आप में एक पौराणिक महत्व रखती है। आप सभी जानते हैं कि जब भी अयोध्यापुरी को देखा जाता है तो उसका एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखकर ही देखा जाता है क्योंकि भगवान श्री हरी ने भगवान श्री राम के रूप में अयोध्यापुरी में अवतार धारण कर अपने भक्तों के कष्टों का निवारण किया था। अयोध्यापुरी में बहने वाली नदी को हम सभी गंगा स्वरूपणी सरयू माता के नाम से जानते हैं। 
उसी अयोध्यापुरी में जब कभी भी आप जाएं तो आप देखेंगे कि वहां पर अनेकों अनेक मंदिर विराजमान हैं जिनमें भगवान श्री राम सहित उनके संपूर्ण परिवार की पूजा अर्चना की जाती है। उन्हीं मंदिरों और आश्रमों में से एक दशरथ महल के नाम से जाना जाता है जहां पर आज भी भगवान श्री राम सहित उनके तीनों भाइयों की पूजा की जाती है अर्थात भगवान श्री राम सहित उनके तीनों भाइयों का मंदिर माना जाता है। 
काफी पुरानी बात है, उस मंदिर के एक महंत हुआ करते थे। उन महंत का नाम था श्री राम प्रसाद जी। यह काफी पुरानी बात है और तब आयोध्या पुरी  में इतनी भीड़ भी नहीं होती थी। दशरथ महल के कर्ताधर्ता के रूप में वहां के महंत श्री रामप्रसाद जी को ही जाना जाता था। दशरथ महल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें भगवान श्री राम अपने तीनो भाई, पत्नियों हुए सेवक हनुमान जी के साथ विराजमान हैं। 

दशरथ महल के महंत श्री रामप्रसाद जी और उनके चेले जो भी छोटे-मोटे संत थे वह सभी फक्कड़ संतों के नाम से जाने जाते थे। उन्हें किसी भी चीज की लालसा न थी। केवल भगवान की भक्ति में रमे रहते थे और मंदिर के चढ़ावे में जो कुछ मिलता था उसी से उनके जीवन का गुजर-बसर होता था।  आप सभी को जानकर आश्चर्य होगा कि उस मंदिर में आने वाले चढ़ावे को उस समय के एक अयोध्यापुरी में रहने वाले बनिए के पास भेज दिया जाता था। उस बनिए की एक किराने की दुकान थी। वह बनिया पलटू बनिए के नाम से जाना जाता था। वह बनिया मंदिर से प्राप्त हुवे चढ़ावे को स्वीकार करके उसके बदले में कुछ अनाज राशन मंदिर को भिजवाया करता था जिससे मंदिर में भगवान के भोग सामग्री तैयार होती थी और भक्तों के साथ-साथ मंदिर के महंतों को भी प्रसाद प्राप्त हो जाता था। 
ऐसे ही दिन कटते रहे परंतु एक समय ऐसा आया जब भगवान ने अपनी लीला रची और मंदिर में कोई भी चढ़ावा चढ़ाने नहीं आया अर्थात मंदिर में कोई दर्शनार्थी ही नहीं आया जिसकी वजह से मंदिर में कोई चढ़ावा प्राप्त नहीं हुआ। बल्कि जो दर्शनार्थी आए उन्होंने भी मंदिर में कोई चढ़ावा नहीं चढ़ाया जिसकी वजह से मंदिर के महंत को बड़ी चिंता हुई क्योंकि बिना चढ़ावे के अनाज कहां से लाएंगे और बिना अनाज के भगवान को भोग कैसे लगाएंगे। भगवान को बिना भोग लगाए उन महंतों को शांति ना पड़ती थी।  अतः सभी बड़े चिंतित हो गए की भगवान को भोग न लग सकेगा और ना ही महंत और उनके चेलों को प्रसाद पा सकेंगे। इन सारी चिंताओं के बीच वह पूरा दिन यूं ही बीत गया। 
पूरा दिन बीत जाने के पश्चात श्री रामप्रसाद जी ने अपने कुछ साधुओ को पलटू बनिए के पास भेजा और उनसे प्रार्थना की कि आज मंदिर में कोई भी चढ़ावा नहीं आया है अतः आप हमें कुछ अनाज व् राशन उधार देने का कष्ट करें। कल जब मंदिर में चढ़ावा आएगा तब हम आपका उधार चुका देंगे। यह सब सुनने के बाद पलटू बनिए ने कहा कि मेरा और महंत जी का जो संबंध है वह  नगद का है उधार का नहीं और मैं उधार का व्यापार करता भी नहीं अतः जो भी आपको राशन चाहिए वह सब कुछ नगद में ही देना होगा अगर आपके पास नगद है तो ही मैं आपको अनाज दूंगा अन्यथा मैं उधार देने में असमर्थ हूं उनकी यह बात सुनकर आश्रम की ओर से आया हुआ ब्राह्मण वापस महंत जी के पास लौट गया और उसने पलटू बनिया की सारी बात महंत जी को कह सुनाई तत्पश्चात महंत जी के आदेश अनुसार उस दिन आश्रम में भोजन ना बना और भगवान को सिर्फ पानी का भोग लगाया गया। भगवान ने पानी पिया और उसी को भोग लगाया और महंत जी और उनके चेलों ने भी उस दिन पानी को ही प्रसाद के रूप में ग्रहण किया और पानी से भूल शांत की। 
रामप्रसाद जी बहुत ही धैर्यशील प्राणी थे उन्होंने जैसी भगवान की इच्छा समझकर उसे स्वीकार किया और उस दिन जल पर ही आश्रित रहे। शाम होते होते उन्होंने भगवान की आरती की। भगवान को जल रूपी भोगी अर्पित किया और भगवान का भजन कीर्तन करते हुए रामप्रसाद जी ने अपने चेलों के साथ भगवान का भजन कीर्तन आरंभ किया और भगवान के नाम धुन गुनगुनाते रहे तत्पश्चात धीरे-धीरे शयन आरती का समय हुआ और भगवान की शयन आरती की। रामप्रसाद जी ने घंटा बजाकर आरती संपन्न की। पूरे दिन भूखे प्यासे रहने के कारण श्री रामप्रसाद जी और उनके चेले बहुत अधिक थक गए थे जिसके कारण उन्हें नींद भी आ रही थी। 
धीरे-धीरे रात गुजरने लगी और जब राह के लगभग 12 से 2 का समय हो रहा था, उस वक्त पलटू बनिए के घर के दरवाजे पर कुछ आहट होने लगी। जब ध्यान से पलटू बनिए ने सुना तो उसे महसूस हुआ की कुछ बच्चे उसके घर के किवाड़ पर शोर मचा रहे हैं। पलटू बनिया नींद में था और उसे अत्यधिक क्रोध आया उन बच्चों के ऊपर जिसके पश्चात उसने सोचा की अभी इन बच्चों को डांट कर भगा देता हूं परंतु जब उसने दरवाजा खोला तो उसने देखा कि चार सुंदर बालक पितांबर ओढ़ कर सामने खड़े हैं। वे चारों बालक एक ही पितांबर को ओढ़े हुए थे और उनका दृश्य इतना मनमोहक था कि उनको देखने के पश्चात पलटू बनिया उन्हें डांटने वाली बात तो भूल ही गया। उन्हें देखकर वह इतना मोहित हो रहा था कि पलटू बनियों को बार-बार लग रहा था कि इतने प्यारे बालक आज मेरे द्वार पर कैसे आए। वह भी इतनी आधी रात को उन्हें देखकर पलटू को उनके प्रति अत्यधिक प्रेम आने लगा क्योंकि वह बालक छोटे थे। उनकी आयु व्यवस्था लगभग 12 वर्ष से भी कम ही रही होगी। उन चारों बालको की छवि को देखकर पलटू बनिया मोहित हो गया क्योंकि उसने ऐसी मनमोहक लुभावनी छवि पहले कभी नहीं देखी थी। पलटू बनिया उनकी सुंदरता को देखता रह गया। इतने में ही वह चारों बालक पितांबर ओढ़े पलटू बनिए के घर में बिना अनुमति के प्रवेश कर गए। पलटू बनिया कुछ कह पाता उससे पहले ही बच्चों ने घर में प्रवेश कर लिया और पलटू बनिए ने जब पूछा कि तुम लोग कौन हो और इतनी रात को मेरे घर के बाहर क्यों शोर मचा रहे थे तब उन बच्चों ने जवाब दिया कि हमें रामप्रसाद बाबा जी ने भेजा है। बच्चों ने कहा हमने जो पितांबर पहना है इसके कोने में एक गांठ लगी है जिसमें 16 सो रुपए हैं। आप उन 1600 रूपियो को ले लीजिए और कल सुबह अनाज राशन सामग्री इत्यादि आश्रम को भिजवा दीजिएगा।
यह बात सुनकर पलटू बनिया बहुत ही आश्चर्य चकित हुआ क्योंकि वह समय ऐसा था जब रुपया नहीं बल्कि पैसा और कौड़िया चला करती थी परंतु पलटू बनिए ने अफरा-तफरी में उस पितांबर के कोने की गांठ खोली और जब देखा तो देखते ही जो दृश्य उसके सामने आया उसे वह आश्चर्यचकित था क्योंकि उस पितांबर के कोने की गांठ खोलने पर उसमें सत्य में सोलह सौ चांदी के सिक्के उपलब्ध थे जिन्हें देखने के पश्चात पलटू बनिया ग्लानि से भर गया उसे लगा कि उसने महंत जी के साथ बहुत ही दुर्व्यवहार किया है जिसके कारण ही महंत जी ने आधी रात को इन छोटे बालकों के साथ यह इतनी बड़ी रकम भेजकर मुझे मेरे किए का दंड दिया है।
पलटू बनिए ने अपने जीवन में इतनी बड़ी रकम एक साथ कभी नहीं देखी थी। पलटू बनिए ने कहा यह तो बहुत बड़ी रकम है। इतनी बड़ी रकम के बदले मैं आजीवन भी राशन आश्रम को भेजता रहूंगा तो भी यह कर्जा कभी उतार नहीं सकूंगा, 1 दिन में तो देने की बात असंभव लगती है। तब उन चारों बालकों ने कहा कोई बात नहीं आप एक साथ मत दीजिए पर प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा राशन अनाज सहित आश्रम को भिजवा दिया कीजिएगा। इतना कहकर वह चारों बालक वहां से तत्काल वापस चले गए और जाते-जाते अपना पीतांबर वहीं छोड़ गए। पलटू बनिया बहुत ही विस्मय भरी दृष्टि से उन बच्चों को निहारता रह गया और बच्चे वहां से चले गए। 
धीरे-धीरे रात बीत गई और दशरथ महल में जब भगवान की मंगला आरती का समय आया तब रामप्रसाद जी ने भगवान के मंदिर के किवाड़ खोलें। जब भगवान के मंदिर के किवाड़ खोले गए तो देखा गया कि भगवान ने अपने चारों भाइयों के साथ जो पितांबर ओढ़ रक्खा था वह पितांबर गायब हो गया है। रामप्रसाद जी और उनके साथ उनके चेले जितने भी थे वह सभी आश्चर्यचकित थे। उन सभी को लग रहा था कि रात में आश्रम में चोरी हुई है जिसके कारण चोर भगवान का पितांबर भी चुरा ले गए हैं। इन्हीं सब बातों की चर्चा रामप्रसाद जी और अन्य साधुओं के बीच में हो रही थी तभी अचानक गेट पर खटखट की आवाज सुनाई पड़ती है और आश्रम के द्वार पर देखने पर मालूम पड़ता है कि पलटू बनिया बहुत सारे राशन की सामग्री को साथ लेकर एक बैलगाड़ी के साथ वहां पर उपस्थित हो गया है। 
पलटू बनिया शर्म के मारे साहस नहीं जुटा पा रहा था। रामप्रसाद जी का सामना करने के लिए कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़े हुए पलटू बनिया आगे बढ़ा और रामप्रसाद जी के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा याचना करने लगा। रामप्रसाद जी तो रात को घटित समस्त घटनाओं से अनभिज्ञ थे। उन्हें पता ही नहीं था कि यह किस बात की माफी मांग रहा है। तब पलटू बनिया ने बोला कि, महाराज मैंने कल आपको राशन उधार नहीं दिया। मैंने आपका अपमान किया जिससे कुपित होकर आपने आधी रात को छोटे-छोटे चार बालकों के साथ मुझे  ₹1600 की बड़ी राशि भिजवाई। मैं अपने कृत्य के लिए आपसे क्षमा प्रार्थी हूं। 
पलटू बनिए ने बार-बार अपने दुर्व्यवहार के लिए महंत रामप्रसाद जी से क्षमा याचना की और उन्हें वह पितांबर लौट आया जो पितांबर रात में वह सुंदर बच्चे पलटू बनिए के घर छोड़ गए थे।
महंत जी ने कहा हमने तो किसी बच्चे को तुम्हारे घर नहीं भेजा था परंतु जब उन्होंने पलटनिया के द्वारा दिया हुआ वह पीतांबर देखा तब उन्हें ज्ञात हुआ कि यह तो वही पितांबर है जो हमारे मंदिर में भगवान श्री राम और उनके चारों भाइयों को उढ़ाया जाता है। उस पितांबर को देखकर महंत श्री रामप्रसाद जी सारी बात समझ गए और चुपचाप बिना कुछ कहे मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर रोने लगे। रोते-रोते भावुक हो गए और भगवान से बोले हे प्रभु सारा जीवन अर्पित हो गया केवल तुम्हारी भक्ति और पूजा करते करते और तुमने दर्शन भी दिए तो उस पलटू बनिए को। हम तुम्हारे दर्शनों से वंचित रह गए पर अगले ही पल रामप्रसाद जी ने भगवान से कहा कि हे प्रभु आप करुणानिधान हैं। आपसे अपने भक्तों की भूख देखी नहीं गई। इसलिए आधी रात को आपको अपने भक्तों के लिए पलटू बनिए के घर जाना पड़ा और हमारे लिए राशन की व्यवस्था करवाई। हे प्रभु आप दीनानाथ हैं, आप करुणानिधान हैं, आप सर्वज्ञ हैं आप सर्वत्र हैं। 

महंत श्री रामप्रसाद जी को रोते हुए देख पलटू बनिए ने उनसे रोने का कारण पूछा और जब सारी बात पलटू बनिए को पता चली तो पलटू बनिए का हृदय सन्न रह गया। वह भी अपनी किस्मत को कोसता रह गया कि मैं जिन्हें कोमल सा बालक समझ रहा था वह स्वयं तीनों लोको के पालनहार थे और मेरे दरवाजे पर आए, मेरे घर में आए और मैं अभागा उनके चरण स्पर्श भी ना कर सका। मैं उन्हें बैठने के लिए स्थान भी ना दे सका। इन सारी बातों की गिलानी करते-करते पलटू बनिया फूट-फूट कर रोने लगा और रामप्रसाद जी और पलटू बनिया एक दूसरे से अपनी व्यथा कहने लगे। 

उस दिन की इस घटना के बाद से आश्रम में कभी भी अनाज व राशन की कमी ना रही। पलटू बनिया निरंतर आश्रम को राशन भेजता रहा और 1 दिन इस पलटू बनिया को वैराग्य हो गया और वैराग्य धारण करने के पश्चात पलटू बनिया संसार में पलटू दास के नाम से विख्यात हुआ।
उस दिन के पश्चात से श्री रामप्रसाद जी की व्याकुलता इस कदर बढ़ती चली गई कि भगवान के भजन कीर्तन करते करते वह बार-बार मूर्छित होकर गिर पड़ते थे। संसार के लिए वह मूर्छित अवस्था उनके भाव विभोर होने के कारण थी परंतु उस मूर्छित अवस्था में ही भगवान पत्नियों सहित अपने भाइयों के साथ महंत श्री राम दास जी को दर्शन दिया करते थे और उनकी इच्छाओं को पूर्ण करते थे। 
महंत श्री रामप्रसाद जी के समय के बाद से आज तक दशरथ महल में कभी भी राशन की कमी नहीं रही। आज भी वहा निरंतर भगवान को भोग लगता है और अनेकों अनेक भक्त प्रसाद पाते हैं। आज भी दशरथ महल में भगवान श्री राम अपने तीनों भाइयों सहित पत्नियों के साथ विराजते हैं और भक्तों को दर्शन देकर उनका कल्याण करते हैं। 
भगवान की इच्छा के विरुद्ध तो संसार में एक पत्ता भी नहीं हिलता। हम सभी यह जानते हैं परंतु जानते हुए भी अपने जीवन में भगवान के प्रति अविश्वास रखते हैं। उन पर अपनी आस्था दृढ़ नहीं रखते। भगवान इन छोटी-छोटी लीलाओं से यह बताने का प्रयास करते हैं कि मैं तुम सबके समक्ष तुम सबके भीतर ही निवास करता हूं। तुम सब के पल-पल की खबर रखता हूं। तुम मुझे जैसा मानोगे, तुम मुझे जैसा प्रेम करोगे, तुम मुझे जैसे ध्याओगे मैं भी तुम्हें वैसा ही ध्याऊंगा, वैसा ही प्रेम करूंगा, वैसे ही तुम्हारी देखभाल करूंगा। अतः हम सभी को भगवान की शक्तियों पर पूर्ण विश्वास करते हुए अपनी भक्ति को और भी दृढ़ संकल्प करके भगवान के प्रति अपने संपूर्ण जीवन को समर्पित करना चाहिए। 

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