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49 Marut Kya Hai? | वैदिक साहित्य में वायु के 49 प्रकार व वैज्ञानिक आधार

सनातन वैदिक परंपरा और भारतीय पौराणिक शास्त्रों में प्रकृति के प्रत्येक तत्व को दिव्य स्वरूप और चेतना से युक्त माना गया है। पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में वायु तत्व जीवन का मूलाधार है। तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के सुंदरकांड में जब हनुमान जी द्वारा लंका दहन का प्रसंग आता है, तब वहां वायु के अत्यंत शक्तिशाली रूप का वर्णन मिलता है।

तुलसीदास जी लिखते हैं:

“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥”

भावार्थ: जब हनुमान जी ने लंका में अग्नि प्रज्वलित की, तब भगवान श्री हरि विष्णु की प्रेरणा से समस्त 49 मरुत (वायु के 49 प्रकार) अत्यंत तीव्र वेग से प्रवाहित होने लगे। हवा के इस प्रचंड वेग के कारण लंकापुरी धू-धू करके जलने लगी। उसी समय हनुमान जी ने अट्टहास करते हुए गर्जना की और अपना आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे।

प्रायः आम धारणा यह होती है कि हवा केवल एक ही प्रकार की होती है जो हमारे आसपास बहती है। किंतु हमारे प्राचीन वैदिक ऋषियों और शास्त्रों ने आकाश, थल, पाताल, अंतरिक्ष, सूर्यमंडल, चंद्रमंडल और नक्षत्रमंडल में बहने वाली वायु को 7 मुख्य शाखाओं और 49 उप-प्रकारों (7×7 = 49 मरुद्गण) में विभाजित किया है। आइए, इस लेख में उनचास मरुत के गूढ़ अर्थ, उत्पत्ति कथा, वर्गीकरण और वैज्ञानिक महत्व को विस्तार से समझते हैं।


मरुद्गण (49 मरुत) की पौराणिक उत्पत्ति कथा

वैदिक साहित्य एवं श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, मरुद्गण देवराज इंद्र के घनिष्ठ सहयोगी और देव सेना के प्रमुख अंग माने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति से जुड़ी हुई है।

दिति का कठिन तप और इंद्र का छल:

पुराणों के अनुसार, दैत्यों की माता दिति अपने पुत्रों के देवताओं द्वारा मारे जाने पर अत्यंत दुःखी थीं। उन्होंने अपने पति महर्षि कश्यप से एक ऐसा पुत्र मांगा जो देवराज इंद्र का वध कर सके और देवताओं पर विजय प्राप्त कर सके। महर्षि कश्यप ने दिति को एक विशेष व्रत और नियमबद्ध तपस्या का मार्ग बताया और कहा कि यदि वे एक वर्ष तक पवित्रता और नियमों का पालन करेंगी, तो उन्हें इंद्र-हंता पुत्र की प्राप्ति होगी।

दिति ने कठोर तपस्या आरंभ की। जब देवराज इंद्र को इस बात का भान हुआ, तो वे दिति की सेवा करने के बहाने उनके पास आ गए और छल करने का अवसर ढूंढने लगे। एक दिन संध्या काल में दिति बिना आचमन किए और अपने केश (बाल) खोले बिना सो गईं। इस अशुद्धि का लाभ उठाकर इंद्र सूक्ष्म रूप धारण करके दिति के गर्भ में प्रवेश कर गए।

गर्भ के 49 टुकड़े और मरुत का जन्म:

इंद्र ने अपने वज्र से दिति के गर्भस्थ शिशु के 7 टुकड़े कर दिए। जब वे टुकड़े रोने लगे, तो इंद्र ने उनसे कहा— “मा रुदः” (अर्थात ‘रोओ मत’)। इसके पश्चात इंद्र ने पुनः वज्र का प्रयोग करके उन 7 टुकड़ों में से प्रत्येक के 7-7 टुकड़े और कर दिए। इस प्रकार गर्भ के कुल 49 (7 × 7) खंड हो गए।

भगवान श्री हरि की लीला और महर्षि कश्यप के तपोबल के कारण वे 49 टुकड़े मरे नहीं, बल्कि दिव्य बालक बन गए। दिति की निद्रा खुलने पर जब उन्हें संपूर्ण घटनाक्रम का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने इंद्र से पूछा। इंद्र ने अपनी भूल स्वीकार की और प्रार्थना की। तत्पश्चात, उन 49 बालकों को देवताओं के समान स्थान मिला और वे ‘मा रुदः’ शब्द के कारण मरुद्गण (Maruts) कहलाए। इंद्र ने उन्हें अपना मित्र और वायु का अधिष्ठाता देव स्वीकार कर लिया।

Unchaas Marut - 49 Types of Air in Vedic Sciences

वेदों में वर्णित वायु की 7 प्रमुख शाखाएं

वैदिक एवं पौराणिक खगोल विज्ञान के अनुसार, वायु केवल धरातल पर सांस लेने का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड, ग्रह-नक्षत्रों, सूर्य और चंद्र मंडलों को अपनी कक्षा में गतिमान रखने वाली सूक्ष्म ऊर्जा है। ऋग्वेद और वायु पुराण में वायु की 7 मुख्य शाखाओं का उल्लेख मिलता है:

1. प्रवह वायु (Pravaha Vayu)

प्रवह नाम की वायु आकाश में मेघ मंडल (बादलों की परत) के भीतर स्थित होती है। इसका मुख्य कार्य समुद्र से वाष्पीकृत जल को बादलों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना और वर्षा कराना है। यह बादलों को गति प्रदान करके वर्षा योग्य बनाती है।

2. आवह वायु (Aavaha Vayu)

आवह वायु का निवास स्थान सूर्य मंडल माना जाता है। ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार, यही वायु ध्रुव तारे से आबद्ध होकर सूर्य मंडल को अपनी धुरी पर घुमाने और सौर ऊर्जा के संचालन में सहयोग करती है।

3. उद्वह वायु (Udvaha Vayu)

उद्वह वायु का मुख्य स्थान चंद्र मंडल में स्थित है। यह वायु चंद्र मंडल को गति प्रदान करती है और समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा तथा औषधियों में रस भरने की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है।

4. संवह वायु (Samvaha Vayu)

संवह नाम की वायु नक्षत्र मंडल में व्याप्त होती है। ब्रह्मांड में जितने भी तारे और नक्षत्र हैं, उन्हें अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थिर रखने और गति देने का कार्य संवह वायु द्वारा ही संपन्न होता है।

5. विवह वायु (Vivaha Vayu)

विवह वायु का स्थान ग्रह मंडल माना गया है। हमारे सौरमंडल के समस्त ग्रह (जैसे मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि आदि) इसी विवह वायु के प्रभाव से अपनी-अपनी कक्षाओं में परिक्रमण करते हैं।

6. परिवह वायु (Parivaha Vayu)

परिवह वायु का निवास स्थान सप्तऋषि मंडल (Saptarshi Constellation) है। यह वायु सप्तऋषि मंडल को ब्रह्मांडीय परिधि में भ्रमण करने में सहायता प्रदान करती है और आकाशगंगा के संतुलन को बनाए रखती है।

7. परावह वायु (Paravaha Vayu)

परावह वायु का निवास स्थान ध्रुव मंडल (North Star Zone) माना जाता है। यह ब्रह्मांड की सबसे बाहरी सीमा पर स्थित अति सूक्ष्म वायु है, जो संपूर्ण ब्रह्मांडीय पिंडों और मंडलों को ध्रुव केंद्र से बांधकर स्थिर रखती है।


49 मरुत (7 × 7) का संपूर्ण वर्गीकरण तालिका

वेदों के अनुसार, ऊपर बताई गई वायु की इन 7 प्रमुख शाखाओं में से प्रत्येक शाखा के 7-7 गण (सब-टाइप्स) होते हैं, जो विभिन्न लोकों और दिशाओं में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार 7 × 7 = 49 मरुत बनते हैं। नीचे इनकी विस्तृत वर्गीकरण तालिका दी जा रही है:

क्र. सं. वायु की मुख्य शाखा मुख्य निवास स्थान / क्षेत्र उप-गणों की संख्या मुख्य कार्य व विशेषता
1 प्रवह (Pravaha) मेघ मंडल (भूलोक/अंतरिक्ष) 7 गण बादलों को गति देना व वर्षा कराना।
2 आवह (Aavaha) सूर्य मंडल 7 गण सूर्य की किरणों व सौर-मंडल को घुमाना।
3 उद्वह (Udvaha) चंद्र मंडल 7 गण चंद्रमा की गति व शीतलता का संचरण।
4 संवह (Samvaha) नक्षत्र मंडल 7 गण तारों और नक्षत्रों को कक्षा में रखना।
5 विवह (Vivaha) ग्रह मंडल 7 गण समस्त नवग्रहों को परिभ्रमण कराना।
6 परिवह (Parivaha) सप्तऋषि मंडल 7 गण सप्तऋषियों के मंडल को गति देना।
7 परावह (Paravaha) ध्रुव मंडल / अंतिम ब्रह्मांडीय सीमा 7 गण ध्रुव केंद्र से समस्त मंडलों का संतुलन।

शरीर में स्थित 5 मुख्य व 5 उप-प्राण वायु

वैदिक भौतिकी के साथ-साथ आयुर्वेद और योग विज्ञान में भी मानव शरीर के भीतर चलने वाली वायु को वर्गीकृत किया गया है। शरीर के भीतर कार्य करने वाली वायु को ‘प्राण’ कहा जाता है, जिसके मुख्य 5 प्रकार और 5 उप-प्रकार होते हैं:

5 मुख्य प्राण वायु:

  • प्राण (Prana): यह वायु हृदय और नासिका क्षेत्र में स्थित होती है। इसका कार्य श्वास-प्रश्वास (Inhalation & Exhalation) को नियंत्रित करना है।
  • अपान (Apana): यह वायु नाभि से निचले भाग में स्थित होती है। यह मल, मूत्र, और प्रसव क्रिया को निष्कासित करने में सहायक होती है।
  • समान (Samana): यह वायु नाभि क्षेत्र (जठराग्नि) में स्थित होती है। इसका कार्य भोजन को पचाना और शरीर में रस-रक्त का समान वितरण करना है।
  • उदान (Udana): यह वायु कण्ठ और मस्तिष्क क्षेत्र में होती है। यह वाणी, विचार, और शरीर को ऊर्ध्व गति (ऊपर की ओर) प्रदान करती है।
  • व्यान (Vyana): यह वायु संपूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है। यह रक्त संचार और शरीर की सभी गतिविधियों का संचालन करती है।

5 उप-प्राण वायु:

  • नाग: डकार और उबकाई को नियंत्रित करना।
  • कूर्म: पलकों के झपकने की क्रिया को संचालित करना।
  • कृकल: भूख और प्यास का अहसास कराना तथा छींक लाना।
  • देवदत्त: जम्हाई (उबासी) लाना और आलस्य दूर करना।
  • धनंजय: शरीर की मृत्यु के पश्चात भी कुछ समय तक विद्यमान रहना और शरीर को फुलाना।

वैदिक ज्ञान और आधुनिक मौसम विज्ञान (Meteorology)

जब हम प्राचीन सनातन ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषियों का वायु ज्ञान अत्यंत वैज्ञानिक था। आधुनिक मौसम विज्ञान (Modern Meteorology) आज पृथ्वी के वायुमंडल (Troposphere, Stratosphere, Mesosphere, Ionosphere, Exosphere आदि) की परतों की बात करता है, जबकि वेदों में सहस्रों वर्ष पूर्व ही धरातल से लेकर दूरस्थ ध्रुव मंडल और अंतरिक्षीय कक्षाओं में चलने वाली वायु का सटीक वर्गीकरण कर दिया गया था।

तुलसीदास जी द्वारा सुंदरकांड में ‘मरुत उनचास’ का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि मध्यकालीन भारत में भी यह वैदिक ज्ञान जन-सामान्य और कवियों के ज्ञानवर्धन का हिस्सा था। लंका दहन के समय जब भगवान की इच्छा से ये 49 प्रकार की वायु एक साथ उग्र रूप में चलीं, तो उसने अग्नि को इतना विकराल बना दिया कि विशालकाय स्वर्ण लंका क्षण भर में भस्म हो गई।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.1: ‘मरुत उनचास’ (49 मरुत) का क्या अर्थ है?

उत्तर: ‘मरुत उनचास’ का अर्थ है वायु के 49 दिव्य स्वरूप या प्रकार। वेदों में वायु की 7 मुख्य शाखाएं बताई गई हैं, और प्रत्येक शाखा के 7-7 गण होते हैं, जिससे कुल 7 × 7 = 49 मरुत बनते हैं।

प्र.2: सुंदरकांड में 49 मरुत का उल्लेख किस प्रसंग में आता है?

उत्तर: सुंदरकांड में जब हनुमान जी लंका में अपनी पूंछ से आग लगाते हैं, उस समय लंका को पूर्णतः भस्म करने के लिए ईश्वर की प्रेरणा से सभी 49 मरुत (प्रचंड पवन) एक साथ चलने लगते हैं।

प्र.3: मरुद्गण के माता-पिता कौन हैं?

उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मरुद्गण की माता दिति और पिता महर्षि कश्यप हैं। बाद में देवराज इंद्र ने इन्हें अपना सहयोगी स्वीकार किया।

प्र.4: सूर्य मंडल और चंद्र मंडल में बहने वाली वायु का क्या नाम है?

उत्तर: सूर्य मंडल में बहने वाली वायु को ‘आवह’ और चंद्र मंडल में बहने वाली वायु को ‘उद्वह’ कहा जाता है।

प्र.5: मानव शरीर में कितनी मुख्य वायु (प्राण) होती हैं?

उत्तर: मानव शरीर के भीतर 5 मुख्य प्राण वायु (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) और 5 उप-प्राण वायु (नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय) कार्य करती हैं।


निष्कर्ष: सनातन ग्रंथों में वर्णित ‘उनचास मरुत’ का ज्ञान यह दर्शाता है कि हमारा प्राचीन साहित्य कितना समृद्ध और वैज्ञानिक था। रामायण और पुराणों को केवल कथा के रूप में न पढ़कर उनके गूढ़ अर्थों को समझना प्रत्येक सनातन प्रेमी का कर्तव्य है।

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