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ऋण मोचक मंगल स्तोत्र: भारी से भारी कर्ज से मुक्ति पाने का अचूक उपाय

क्या आप कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं? क्या कड़ी मेहनत के बाद भी आपका पैसा बीमारियों या फालतू के खर्चों में निकल जाता है? ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, जब कुंडली में मंगल ग्रह (Mars) की स्थिति प्रतिकूल होती है, तो व्यक्ति चाहकर भी ऋण (Loan) से बाहर नहीं निकल पाता। ​ऐसे में 'ऋण मोचक मंगल स्तोत्र' का पाठ एक रामबाण उपाय माना गया है। आइए जानते हैं इसकी महिमा और पाठ करने की सही विधि। ​क्यों होता है कर्ज? ज्योतिषीय कारण ​शास्त्रों के अनुसार, मंगल को 'भूमिपुत्र' और 'ऋणहर्ता' माना गया है। यदि मंगल प्रसन्न हों, तो व्यक्ति को भूमि, भवन और धन का सुख मिलता है। लेकिन मंगल दोष होने पर व्यक्ति अनचाहे ऋण के जाल में फंस जाता है। ऋण मोचक स्तोत्र का जाप मंगल के नकारात्मक प्रभाव को कम कर धन आगमन के नए स्रोत खोलता है। ​ऋण मोचक मंगल स्तोत्र की पाठ विधि ​इस स्तोत्र का पूरा लाभ लेने के लिए इसे नियमपूर्वक करना चाहिए: ​ दिन और समय: इसे किसी भी मंगलवार से शुरू करें। शुक्ल पक्ष का मंगलवार हो तो और भी श्रेष्ठ है। ​ वस्त्र और पूजन: स्नान के बाद लाल रंग के वस्त्र धारण...

श्रीराम ने राम सेतु क्यों तोड़ा था ?

श्री राम ने सेतु क्यों तोड़ दिया ?

वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है की देवी सीता का पता लगने के पश्चात जब भगवान श्री राम समुद्र पर सेतु बांधने को उद्यत हुए तब समस्त वानर और भालुओ ने राम सेतु का निर्माण करने में भगवान श्री रामचंद्र की सहायता की और देखते ही देखते लंका तक एक सेतु का निर्माण कर दिया।  लेकिन जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही तोड़ दिया था। ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। रामसेतु स्वयं भगवान श्रीराम ने अपने हाथों से थोड़ा और उन्होंने रामसेतु को किन परिस्थितियों में थोड़ा इन समस्त बातों की जानकारी सृष्टि खंड की एक कथा में  मिलती है।
पद्म पुराण के अनुसार, अपने वनवास को पूर्ण करने के पश्चात भगवान श्री राम जब अयोध्या में राज कर रहे थे तब एक दिन अचानक उन्हें रावण के छोटे भाई विभीषण की याद आई और उनके हृदय में विभीषण को लेकर यह चिंता उत्पन्न हुई कि रावण के मरने के बाद विभीषण किस तरह लंका का राज्य संभाल रहे होंगे। विभीषण सकुशल तो होगा? उसे कोई चिंता या परेशानी तो नहीं हो रही होगी लंका का राज्य संभालने में? जब भगवान श्री राम विभीषण की चिंता में मग्न थे उसी क्षण भगवान श्री राम के छोटे भाई भरत जी का आगमन हो गया। 
भरत के पूछने पर श्रीराम ने उन्हें पूरी बात बताई। ऐसा विचार मन में आने पर श्रीराम ने लंका जाने का विचार किया। भरत भी उनके साथ जाने को तैयार हो जाते हैं। अयोध्या की रक्षा का भार लक्ष्मण को सौंपकर श्रीराम व भरत पुष्पक विमान पर सवार होकर लंका जाते हैं।
जब श्रीराम व भरत पुष्पक विमान से लंका जा रहे होते हैं, रास्ते में किष्किंधा नगरी आती है। श्रीराम व भरत थोड़ी देर वहां ठहरते हैं और सुग्रीव व अन्य वानरों से भी मिलते हैं। जब सुग्रीव को पता चलता है कि श्रीराम व भरत विभीषण से मिलने लंका जा रहे हैं, तो वे उनके साथ हो जाते हैं। 
रास्ते में श्रीराम भरत को वह पुल दिखाते हैं, जो वानरों व भालुओं ने समुद्र पर बनाया था। जब विभीषण को पता चलता है कि श्रीराम, भरत व सुग्रीव लंका आ रहे हैं तो वे पूरे नगर को सजाने के लिए कहते हैं। विभीषण श्रीराम, भरत व सुग्रीव से मिलकर बहुत प्रसन्न होते हैं।
श्रीराम तीन दिन तक लंका में ठहरते हैं और विभीषण को धर्म-अधर्म का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि तुम हमेशा धर्म पूर्वक इस नगर पर राज्य करना। विभीषण को धर्म का ज्ञान देने के पश्चात जब भगवान श्री राम अयोध्या लौटने के लिए पुष्पक विमान पर आरूढ़ हुए तब विभीषण ने भगवान श्री रामचंद्र से प्रार्थना की और कहा प्रभु आपने जो ज्ञान मुझे दिया है उसी ज्ञान के अनुसार में अपना राज्य धर्म निभाऊंगा परंतु मेरे मन में एक चिंता और शंका है। प्रभु जब-जब आप के बनाए हुए सेतु से मनुष्य आकर मुझे पीड़ा पहुंचाने लगेंगे उस वक्त मुझे क्या करना होगा। 
विभीषण के ऐसा कहने पर श्रीराम ने अपने बाणों से उस सेतु के दो टुकड़े कर दिए। फिर तीन भाग करके बीच का हिस्सा भी अपने बाणों से तोड़ दिया। इस तरह स्वयं श्रीराम ने ही रामसेतु तोड़ा था।
अतः हम कह सकते है की अपने भक्त विभीषण की प्रार्थना पर स्वयं प्रभु श्री राम ने राम सेतु को तोड़ा था।

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