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सनातन धर्म में कुल कितने पुराण हैं?

सनातन धर्म के अनगिनत पुराणों का अनावरण पुराणों में समाहित गहन रहस्यों को उजागर करने की यात्रा पर निकलते हुए सनातन धर्म के समृद्ध ताने-बाने में आज हम सभी गोता लगाएंगे। प्राचीन ग्रंथों की इस खोज में, हम कालातीत ज्ञान और जटिल आख्यानों को खोजेंगे जो हिंदू पौराणिक कथाओं का सार हैं। पुराण ज्ञान के भंडार के रूप में कार्य करते हैं, जो सृष्टि, नैतिकता और ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाली ब्रह्मांडीय व्यवस्था के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। प्रत्येक पुराण किंवदंतियों, वंशावली और दार्शनिक शिक्षाओं का खजाना है जो लाखों लोगों की आध्यात्मिक मान्यताओं को आकार देना जारी रखते हैं। आइए हम कहानियों और प्रतीकात्मकता की भूलभुलैया से गुज़रते हुवे रूपक और रूपक की परतों को हटाकर उन अंतर्निहित सत्यों को उजागर करने का प्रयास करें जो सहस्राब्दियों से कायम हैं। हमारे साथ जुड़ें क्योंकि हम इन पवित्र ग्रंथों के पन्नों में मौजूद देवताओं, राक्षसों और नायकों के जटिल जाल को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं, जो मानव अस्तित्व का मार्गदर्शन करने वाले शाश्वत सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हैं। हिंदू धर्म में पुराणों का म...

Yatra Parmanand Maharaj Ki

Yatra Parmanand Maharaj Ki | परमानन्द महाराज की यात्रा 

सनातन धर्म विश्व के सभी धर्मों में सबसे पुरातन धर्म माना गया है। भारत प्राचीन समय से ही विश्व गुरु के रूप में जाना गया। भारत से आध्यात्म की खोज करने के लिए अनेकों आध्यात्मिक संतो ने भारत की दिव्य भूमि में जन्म लिया। उन्होंने वेदो और शाश्त्रो के असाधारण ज्ञान को सरल भाषा में समस्त प्राणिमात्र तक पहुंचाया और उनका मार्ग प्रशस्त किया। 
वेदों का ज्ञान अर्थात वेदांत वचनो को उचित रूप से समस्त प्राणी मात्र के सामने प्रकट करने वाले महान संतों में महामंडलेश्वर युगपुरुष स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज आते हैं। महाराज श्री के जीवन के विषय में जितना कहा जाए उतना कम है क्योंकी  जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश को कोई एक कमरे में बंद करके नहीं रख सकता ठीक उसी प्रकार किसी भी दिव्य आत्मा के विचारों को कोई भी सीमित करके नहीं रख सकता क्योंकि ये विचार समस्त संसार को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए होते हैं। 
हम आपको स्वामी परमानंद जी महाराज का जीवन परिचय विस्तार में बताएंगे। स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज का जन्म भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के एक छोटे से गांव मावी धाम में लगभग 30 के दशक के अंत में हुआ था। उस समय चित्रकूट में एक महान संत हुवा करते थे जिनका नाम श्री स्वामी अखंडानंद जी महाराज था जो कि मध्य प्रदेश के निवासी थे। उन्होंने एक छोटे से बालक जिसका नाम परमानन्द था, उनके गुणों को पहचान लिया और आध्यात्म की ओर उस बालक का लगाव देखते हुवे उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।
आज अपने सन्यास के लगभग 50 वर्षों बाद स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज अपने अनुभव के आधार पर वेदों की सरल व्याख्या को करते हुए अपने अनुभवों को समस्त प्राणी मात्र के साथ साझा कर रहे। वेदो और शास्त्रों की जटिल भाषा को सरलतम रूप में प्रकट कर उसको पुरे विश्व तक पंहुचा रहे है। 
उनके इन्हीं सतकर्मों के कारण समस्त संत समाज ने उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि से सम्मानित किया और अब उन्हें महामंडलेश्वर युगपुरुष स्वामी श्री परमानंद गिरी जी महाराज के नाम से पूरा विश्व जानता है। 
सन 2000 संयुक्त राष्ट्र में विश्व शांति शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ।  स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज को इस सम्मलेन को सम्बोधित करने के लिए बुलाया गया था। इस सम्मलेन में लगभग विश्व के सभी आध्यात्मिक नेताओं ने हिस्सा लिया था। आज पूरा विश्व स्वामी जी को आध्यात्मिक गुरु के रूप में जानता है। 
पुरे विश्व को शांति की ओर ले जाते हुवे परमानंद जी महाराज उत्तर और दक्षिण अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, यूरोप और एशिया के माध्यम से दुनियाभर के देशो में यात्राएं करके वेदांत वचनो की सरल व्याख्या और शान्ति उपदेशो को समस्त विश्व के लोगो तक पंहुचा रहे है। 
महाराज जी के आध्यात्मिक विचारों और उनकी अनूठी तकनीकों के बारे में डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं जिनका हिंदी के साथ-साथ अनेकों विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है और वह प्रकाशित भी हो चुकी हैं। 
संपूर्ण विश्व के मानव समाज के लिए स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज का योगदान अविस्मरणीय है जिसे समस्त प्राणी मात्र एक उपकार के रूप में आज भी मानता है। आज भी स्वामी जी निरंतर समस्त प्राणी मात्र के कल्याण के लिए प्रयास रत है। 

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