Skip to main content

परिवर्तन का सिद्धान्त | Parivartan Ka Siddhant

परिवर्तन का सिद्धान्त Parivartan Ka Siddhant
भगवान् श्री कृष्ण ने भागवत गीता में स्पष्ट रूप से बोला की परिवर्तन संसार का नियम है अर्थात जो आज है वो कल नहीं होगा और जो कल होगा वो परसो नहीं होगा। हर पल को पूर्ण जागृत अवस्था में जीने का नाम जीवन है। आने वाला कल अनिश्चित है पर आने वाला अग्ला पल हमारे हाथो में है और अगर हम चाहे तो आने वाले अगले पल को पूर्णरूप से जी कर अपने भविष्य के लिए सुनहरे सपने बो सकते है। 
Parivartan ka siddhant- Ekadashi Vrat Katha Mahatma

इस संसार में हर प्राणी में भगवान् का निवास है और हर आत्मा भगवान् के होने की सूचक है क्योंकि बिना उस अदृश्य शक्ति के संसार का स्वतः चलना असंभव था। प्राणी के जन्म से लेकर उसके मरण तक हर क्षण कोई ना कोई परिवर्तन उसके जीवन में होता रहता है ।
परिवर्तन के सिद्धान्त को स्वीकार करना प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य होता है। मनुष्य का मानवीय स्वभाव होता है कि हम उन परिवर्तनों को स्वीकार कर लेते है जो मनुष्य के अनुकूल होते है पर जो परिवर्तन प्रतिकूल होते है उन्हें हम स्वीकार नहीं कर पाते। जबकी वेदांत ज्ञान कहता है कि मनुष्य को तटस्थ रहना चाहिए अर्थात समभाव में रहना चाहिए क्योंकि जो मनुष्य समभाव में रहता है को परम सुखी होता है। समत्वभाव में अपना जीवन व्यतीत करने वाला मनुष्य मान अपमान से परे होता है, सुख दुख से परे होता है , वो ना कभी परसान होता है और ना कभी दुखी होता है । सत्य तो ये है कि समभाव वाला मनुष्य हर परिस्थिति में तटस्थ बना रहता है।

Comments

Popular posts from this blog

युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज का जीवन परिचय (Biography)

सनातन धर्म की पुनर्स्थापना और संतों की भूमिका सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। भारत की इस पावन भूमि पर समय-समय पर ऐसी महान विभूतियों ने जन्म लिया है जिन्होंने समाज को नई दिशा दी है। परमानन्द जी महाराज एक ऐसी ही मशाल हैं जिन्होंने अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया है। अध्याय 1: जन्म, बाल्यकाल और प्रारंभिक संस्कार (1935 - 1950) ​ विस्तृत विवरण: स्वामी जी का जन्म 26 अक्टूबर 1935 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक धर्मनिष्ठ परिवार में हुआ था। 30 के दशक का वह दौर भारत में वैचारिक क्रांति का दौर था। ​ पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनके परिवार के संस्कार और बचपन में देखे गए धार्मिक अनुष्ठानों का उन पर क्या प्रभाव पड़ा। ​ बाल्यकाल की अलौकिक घटनाएं: वे बचपन में अन्य बालकों से भिन्न कैसे थे? उनका झुकाव खेल-कूद के बजाय ध्यान और सत्संग की ओर कैसे बढ़ा? ​अध्याय 2: गुरु कृपा और सन्यास का संकल्प ​ चित्रकूट का आध्यात्मिक महत्व: जब हम परमानन्द जी महाराज के जीवन की बात करते हैं, तो स्वामी अखंडानंद जी महाराज का जिक्र अनिवार्य है। ​ प्रथम मिलन: चि...

Vishnu Shodasa Nama Stotram With Hindi Lyrics

विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् की उत्पत्ति   विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान विष्णु को समर्पित एक महामंत्र के रूप में जाना जाता है। सनातन धर्म में त्रिदेवो में भगवान श्री हरि विष्णु अर्थात भगवान नारायण एक विशेष स्थान रखते हैं। सभी प्राणियों को उनके कष्टों से मुक्ति पाने के लिए, उनकी इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् का  प्रतिदिन पाठ करना चाहिए।  विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम् भगवान् श्री हरी के 16 नमो को मिलकर बनाया गया एक महामंत्र है जिकी शक्ति अतुलनीय है। जो साधक प्रतिदिन स्तोत्र का जाप करता है, भगवान श्री विष्णु उस साधक के चारों तरफ अपना सुरक्षा कवच बना देते हैं। उस सुरक्षा कवच के कारण साधक के भोजन से उसकी औषधियां तक भगवान की कृपा से ओतप्रोत हो जाती है और साधक भगवान के संरक्षण को प्राप्त करता है। अतः विष्णु षोडश नाम स्तोत्रम को साधक को पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ जपना चाहिए क्योंकि नियमित रूप से साधक द्वारा पाठ करने से साधक के समस्त रोगो का नाश हो जाता है और साधक दीर्घायु को प्राप्त करता है।  Vishnu Shodasa Nama Sto...

विष्णु अपामार्जन स्तोत्र: दिव्य हीलिंग और असाध्य रोग मुक्ति का मार्ग (Vishnu Apamarjana stotram)

Vishnu Apamarjana Stotram केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय "ध्वनि चिकित्सा" ( Sound Therapy ) का एक अद्भुत उदाहरण है। पद्म पुराण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णित यह स्तोत्र मानसिक शांति, शारीरिक आरोग्य और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। ​अपामार्जन स्तोत्र क्या है? (What is Apamarjana Stotram?) ​'अपामार्जन' का अर्थ है - मार्जन् करना या पोंछकर साफ करना। जिस प्रकार जल शरीर की बाहरी शुद्धि करता है, उसी प्रकार इस स्तोत्र की ध्वनियाँ हमारे सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) से रोगों और नकारात्मक संस्कारों को 'मार्जन्' कर देती हैं। ​मूल स्रोत: यह स्तोत्र मुख्य रूप से दो पुराणों में मिलता है: ​विष्णुधर्मोत्तर पुराण: ऋषि पुलस्त्य और ऋषि दाल्भ्य का संवाद। ​पद्य पुराण: भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया महात्म्य। ​इस स्तोत्र के मुख्य लाभ (Key Benefits for Global Wellness) ​आज के समय में जब पूरी दुनिया Holistic Healing की ओर बढ़ रही है, अपामार्जन स्तोत्र निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है: ​शारीरिक स्वास्थ्य (Physical H...