हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है, लेकिन पापमोचनी एकादशी का अपना एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है—'पाप' को 'मोचन' (नष्ट) करने वाली एकादशी। यह व्रत न केवल धार्मिक पुण्य देता है, बल्कि मनुष्य को अपनी गलतियों का प्रायश्चित कर नए सिरे से जीवन शुरू करने की प्रेरणा भी देता है।
पापमोचनी एकादशी का परिचय
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है। यह होली के बाद और चैत्र नवरात्रि (हिंदू नववर्ष) से ठीक पहले आती है। इस समय को 'संधि काल' माना जाता है, जहाँ हम बीते हुए समय की बुराइयों को त्याग कर नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ते हैं।
पौराणिक व्रत कथा (Mahatmya Katha)
भविष्योत्तर पुराण में इस एकादशी की महिमा का वर्णन मिलता है, जो मेधावी ऋषि और मंजुघोषा नामक अप्सरा से जुड़ी है:
धर्मराज युधिष्ठिर बोले- हे भगवान! मैंने फाल्गुन माह की शुक्लपक्ष की एकादशी का माहात्म्य सुना अब आप चैत्र माह के कृष्णपक्ष की एकादशी के बारे में बतलाइये। इस एकादशी का नाम, इसमें कौन से देवता की पूजा की जाती है तथा विधि क्या है? सो सब सविस्तार पूर्वक कहिये ।
श्री कृष्ण भगवान बोले-हे राजन! एक समय मान्धाता ने लोमश ऋषि से ऐसा ही प्रश्न पूछा था तब लोमश ऋषि ने उत्तर दिया हे राजन! चैत्र माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम पापमोचनी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है।
प्राचीन समय में एक चैत्ररथ वन में अप्सरायें वास करती थीं। वहां हर समय बसन्त रहता था। उस वन में एक मेधावी नामक मुनि तपस्या करते थे। वे शिव भक्त थे। एक दिन मंजुघोषा नामक एक अप्सरा उनको मोहित करने के लिए सितार बजाकर मधुर २ गाने गाने लगी। उस समय शिव के शत्रु अनंग (कामदेव) भी शिव भक्त मेधावी मुनि को जीतने के लिए तैयार हुए। कामदेव ने उस सुन्दर के भ्रू को धनुष बनाया। कटाक्ष को उसकी प्रत्यंचा (डोरी बनाई) उसके नेत्रों को उसने संकेत बनाया और कुचों को कुरी बनाया। उस मंजुघोषा अप्सरा को सेनापति बनाया। इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ।
इस समय मेधावी मुनि भी युवा तथा हृष्ट पुष्ट थे। उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था। उन मुनि को देखकर मंजुघोषा ने मधुरवाणी से वीणा पर गाना शुरू किया। मेधावी मुनि भी मंजुघोषा के मधुर गान पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गये। वह अप्सरा उन मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर आलिंगन करने लगी। वह उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिवरहस्य को भूल गये और काम के वशीभूत होने के कारण उन्हें दिन रात्रि का कुछ भी ध्यान न रहा। एक दिन मंजुघोषा उस मुनि से बोली हे मुनि! अब मुझे बहुत समय हो गया है। स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए उस अप्सरा के ऐसे वचनों को सुनकर मुनि बोले-हे सुन्दरी! तू तो आज इस संध्या को आई है। अभी प्रातःकाल तक ठहरो। मुनि के वचनों को सुनकर वह उनके साथ रमण करने लगी और फिर उसने मुनि से कहा बहुत समय बिता दिया। 
हे मुनिदेव ! अब आप मुझे स्वर्ग को जाने की आज्ञा दीजिये। मुनि बोले-अरी! अभी तो कुछ भी समय नहीं हुआ है अभी कुछ और देर ठहर इस पर वह अप्सरा बोली-हे आपकी रात्रि तो बहुत लम्बी है। अब आप सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया। उस अप्सरा के वचनों को सुनकर मुनि को ज्ञान प्राप्त हो गया और समय का विचार करने लगे। जब रमण करने का समय का प्रमाण ५७ साल ७ माह और ३ दिन ज्ञात हुआ तो उस अप्सरा को काल का रूप समझने लगे। वह महान क्रोधित हुए और तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ देखने लगे। उनके अधर कांपने लगे और इन्द्रियाँ व्याकुल होने लगीं। वह मुनि उस अप्सरा से बोले- हे दुष्ट! मेरे तप को नष्ट करने वाली! तू अब मेरे श्राप से पिशाचिनी हो जा। तू महान पापिनी और दुराचारिणी है। तुझे धिक्कार है।
उस मुनि के श्राप से वह पिशाचनी हो गई तब वह बोली- हे मुनि! अब मुझ पर क्रोध को त्यागकर प्रसन्न हो जाओ और इस शाप का निवारण कीजिये। तब मुनि को कुछ शांति मिली और पिशाचिनी से बोले-रे दुष्ट! मैं शाप से छूटने का उपाय बतलाता हूं। चैत्र माह के कृष्णपक्ष की जो एकादशी है उस का नाम पापमोचनी है उस एकादशी का व्रत करने से तेरी पिशाचनी की देह छूट जायेगी। इस प्रकार ने उसको समस्त विधि आदि बतला दी और अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये! च्वयन ऋषि अपने पुत्र को देखकर बोले रे पुत्र! तूने यह क्या किया? तेरे समस्त तप नष्ट हो गये हैं। मेधावी बोले हे पिताजी मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। आप उसके छूटने का कोई उपाय बतलाइये। च्यवन ऋषि बाले-हे तात! तुम चैत्र माह के कृष्णपक्ष को `पापमोचनी नाम की एकादशी का विधि तथा भक्ति पूर्वक व्रत करो, वचनों को सुनकर मेधावी ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का विधिपूर्वक उपवास किया उसके प्रभाव से इनके समस्त पाप नष्ट हो गये। मंजुघोषा अप्सरा भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से पिशाचनी की देह से छूट गई और सुन्दर रूप धारण करके स्वर्गलोक को चली गई।
लोमश बोले-हे राजन! इस पापमोचनी एकादशी के प्रभाव से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी कथा के श्रवण व पढ़ने से एक हजार गोदान करने का फल मिलता है। इस व्रत के करने से ब्रह्महत्या करने वाले, अगम्बा गमन करने वाले आदि के पाप नष्ट हो जाते हैं। और अन्त में स्वर्ग को जाते हैं।
पूजा विधि (Puja Vidhi)
इस दिन भगवान विष्णु के 'चतुर्भुज' स्वरूप की पूजा की जाती है।
- संकल्प: प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान के सामने व्रत का संकल्प लें।
- वेदी स्थापना: एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें।
- पंचोपचार पूजा: भगवान को पीले फूल, अक्षत (बिना टूटे चावल - केवल पूजा के लिए), चंदन और धूप-दीप अर्पित करें।
- तुलसी अर्पण: भगवान विष्णु को तुलसी दल अत्यंत प्रिय है, इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
- कथा श्रवण: पापमोचनी एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
- पारण: अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय के बाद ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर या भोजन कराकर व्रत खोलें।
लेख के लिए मुख्य बिंदु (Key Highlights)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पापमोचनी एकादशी कब मनाई जाती है?
पापमोचनी एकादशी हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह होली के बाद और चैत्र नवरात्रि से पहले आती है।
2. पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से क्या फल मिलता है?
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह व्रत अनजाने में किए गए पापों के भारी बोझ से मुक्ति दिलाता है। इसे करने से मानसिक शांति, आत्म-शुद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
3. क्या इस दिन चावल खाना वर्जित है?
जी हाँ, हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार सभी एकादशियों पर चावल का सेवन वर्जित माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन चावल में अशुद्धता का वास होता है।
4. इस व्रत में किस देवता की पूजा की जाती है?
पापमोचनी एकादशी पर भगवान विष्णु के 'चतुर्भुज' रूप की पूजा की जाती है। भक्त उन्हें पीले फूल, फल और तुलसी दल अर्पित करते हैं।
5. क्या केवल कथा सुनने से भी लाभ मिलता है?
हाँ, शास्त्रों में उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति पूर्ण उपवास नहीं रख पाता, तो वह श्रद्धापूर्वक इस महात्म्य कथा को पढ़कर या सुनकर भी पुण्य का भागी बन सकता है।

Radhe radhe vihari ji
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