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भीष्म पितामह का अर्जुन को उपदेश: ये 4 प्रकार का भोजन है 'विष' के समान, आज ही त्यागें!

महाभारत का युद्ध केवल अस्त्रों और शस्त्रों का खेल नहीं था, बल्कि यह ज्ञान, नीति और धर्म का एक महासागर था। जब गंगापुत्र भीष्म पितामह कुरुक्षेत्र की रणभूमि में शरशय्या (बाणों की शय्या) पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब उन्होंने पांडवों को जीवन के वह गूढ़ रहस्य बताए जो आज भी कलयुग के प्राणी के लिए 'अमृत' के समान हैं।

​विशेष रूप से, भीष्म पितामह ने अर्जुन को 'भोजन की शुद्धता' पर जो शिक्षा दी, वह हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है। ekadashi.org के इस विस्तृत लेख में, आइए जानते हैं कि भीष्म पितामह ने किन 4 प्रकार के भोजन को 'विष' और 'मदिरा' के समान बताकर उनका त्याग करने को कहा है।

Bhishma Pitamah Arjun Samvad Bhojan Niyam

​अन्न का आध्यात्मिक महत्व

​शास्त्रों में कहा गया है— "जैसा अन्न, वैसा मन"

अन्न साक्षात माता अन्नपूर्णा का स्वरूप है। हम जो भोजन ग्रहण करते हैं, वह केवल पेट नहीं भरता, बल्कि उससे हमारे विचारों का निर्माण होता है। भीष्म पितामह अर्जुन से कहते हैं कि हे कुंतीपुत्र! भोजन की शुद्धता से ही कर्म की शुद्धता सुनिश्चित होती है।

​भीष्म पितामह द्वारा निषेध (वर्जित) किए गए 4 प्रकार के भोजन

​1. लांघा हुआ भोजन: नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश

​यदि परोसे हुए भोजन की थाली के ऊपर से कोई व्यक्ति पैर निकालकर या उसे लांघकर निकल जाए, तो भीष्म पितामह के अनुसार वह भोजन 'नाले की कीचड़' के समान दूषित हो जाता है।

  • वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक पक्ष: प्रत्येक व्यक्ति के शरीर से एक विशिष्ट ऊर्जा (Aura) निकलती है। जब कोई भोजन को लांघता है, तो उसके शरीर की अशुद्ध ऊर्जा और पैरों की धूल के सूक्ष्म कण भोजन को प्रभावित करते हैं। ऐसा भोजन करने से मनुष्य के स्वभाव में तामसिक प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगती हैं।

​2. केश (बाल) युक्त भोजन: दरिद्रता का निमंत्रण

​यदि भोजन की थाली में बाल (केश) निकल आए, तो भीष्म जी उसे 'दरिद्रता का प्रतीक' मानते हैं।

  • क्यों है निषेध? शास्त्रों के अनुसार, जिस भोजन में बाल हो, वह 'राक्षसी भोजन' की श्रेणी में आ जाता है। यदि भूलवश भी ऐसा अन्न शरीर में जाता है, तो वह घर में मानसिक कलह और आर्थिक तंगी (दरिद्रता) लेकर आता है। आधुनिक दृष्टि से भी यह अत्यंत अस्वास्थ्यकर है और संक्रमण का कारण बन सकता है।

​3. ठोकर लगा हुआ भोजन: विष्ठा के समान त्याज्य

​यदि भोजन परोसते समय या थाली रखे होने पर किसी का पैर गलती से लग जाए या ठोकर लग जाए, तो उस भोजन को तुरंत त्याग देना चाहिए।

  • भीष्म पितामह का कथन: पितामह कहते हैं कि ठोकर लगा हुआ भोजन 'भिष्टा' (गंदगी) के समान होता है। अन्न का अपमान साक्षात लक्ष्मी और अन्नपूर्णा का अपमान है। ऐसा भोजन करने से व्यक्ति का तेज और ओज नष्ट हो जाता है और उसे कभी भी शारीरिक पुष्टि प्राप्त नहीं होती।

​4. पति-पत्नी का एक थाली में भोजन: मर्यादा का उल्लंघन

​आजकल के आधुनिक समाज में पति-पत्नी का एक साथ, एक ही थाली में भोजन करना प्रेम का प्रतीक माना जाता है, लेकिन भीष्म पितामह ने इसे 'मदिरा' के समान नशीला और अशुद्ध बताया है।

  • इसके पीछे का गहरा रहस्य: एक ही थाली में भोजन करने से पति का प्रेम केवल पत्नी तक सीमित हो जाता है और वह परिवार के अन्य सदस्यों (माता-पिता, भाई-बहन) के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल सकता है। इसे 'अति-आसक्ति' का कारण माना गया है।
  • पुण्य फल: भीष्म जी कहते हैं कि यदि पति के भोजन करने के बाद पत्नी उसी थाली में बचा हुआ प्रसाद ग्रहण करती है, तो उसे चारों धामों (बद्रीनाथ, जगन्नाथ, द्वारका, रामेश्वरम) के दर्शन का फल प्राप्त होता है।
    Bhishma Pitamah Arjun Samvad Bhojan Niyam

​पिता और कुंवारी कन्या का विशेष प्रसंग: अकाल मृत्यु से सुरक्षा

​लेख के इस भाग में पितामह ने एक अत्यंत चमत्कारी बात कही। उन्होंने बताया कि यदि कोई पिता अपनी कुंवारी पुत्री के साथ एक ही थाली में भोजन करता है, तो वह पुत्री साक्षात 'अकाल मृत्यु' को टालने वाली बन जाती है।

  • आध्यात्मिक कारण: कुंवारी कन्याएं साक्षात जगदंबा का स्वरूप होती हैं। जब वे अपने पिता के साथ भोजन करती हैं, तो उनके पुण्य प्रताप से पिता की आयु बढ़ती है और उन पर आने वाले बड़े संकट टल जाते हैं। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच के समान है।

​भीष्म पितामह के अन्य महत्वपूर्ण सुझाव

  • मौन रहकर भोजन: भोजन करते समय कम से कम बोलना चाहिए ताकि अन्न का पूरा लाभ शरीर को मिले।
  • प्रार्थना: भोजन शुरू करने से पहले ईश्वर का आभार प्रकट करना चाहिए।
  • दिशा का ध्यान: पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके भोजन करना सर्वोत्तम माना गया है।

निष्कर्ष

​भीष्म पितामह का यह ज्ञान मात्र कथा नहीं, बल्कि सुखी जीवन का आधार है। यदि हम अपने दैनिक जीवन में इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें—जैसे बाल वाला भोजन न करना या अन्न का सम्मान करना—तो हमारे घर से दरिद्रता और बीमारियां हमेशा के लिए दूर हो सकती हैं। ekadashi.org का उद्देश्य आपको अपनी इन्ही महान परंपराओं से जोड़ना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या भोजन में बाल निकलने पर पूरी थाली बदल देनी चाहिए?

हाँ, भीष्म पितामह के अनुसार बाल युक्त भोजन अशुद्ध हो जाता है जो दरिद्रता लाता है, अतः उस अन्न को त्याग देना ही उचित है।

2. पति-पत्नी को साथ भोजन क्यों नहीं करना चाहिए?

शास्त्रों के अनुसार, पति-पत्नी का एक ही थाली में साथ भोजन करना मदिरा के समान अशुद्ध माना गया है। पत्नी को पति के उपरांत उसी थाली में भोजन करने से असीम पुण्य मिलता है।

3. क्या पिता अपनी शादीशुदा बेटी के साथ भोजन कर सकता है?

भीष्म पितामह ने विशेष रूप से 'कुंवारी कन्याओं' का उल्लेख किया है, क्योंकि उन्हें देवी स्वरूप माना गया है जो पिता की अकाल मृत्यु को टाल सकती हैं।

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