कनकधारा स्तोत्र: दरिद्रता को जड़ से मिटाने और अपार धन प्राप्ति का अचूक दिव्य मंत्र
आज के भागदौड़ भरे जीवन में आर्थिक स्थिरता और सुख-समृद्धि की चाह हर किसी को होती है। कई बार कठिन परिश्रम के बाद भी फल नहीं मिलता और व्यक्ति कर्ज या दरिद्रता के जाल में फंसा रहता है। शास्त्रों में इस समस्या का सबसे प्रभावी और चमत्कारिक समाधान 'कनकधारा स्तोत्र' (Kanakadhara Stotram) को बताया गया है।
माना जाता है कि यदि पूरी श्रद्धा के साथ इसका पाठ किया जाए, तो यह न केवल धन की कमी को दूर करता है, बल्कि घर में सुख-शांति और माता लक्ष्मी का स्थाई वास भी सुनिश्चित करता है।
कनकधारा स्तोत्र की उत्पत्ति: एक चमत्कारिक कथा
इस स्तोत्र की रचना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। कथा के अनुसार, जब शंकराचार्य एक निर्धन महिला के घर भिक्षा मांगने पहुंचे, तो उस महिला के पास देने के लिए केवल एक सूखा आंवला था। महिला की इस निस्वार्थ भावना और गरीबी को देख शंकराचार्य का हृदय पसीज गया।
उन्होंने माता लक्ष्मी की स्तुति में तत्काल 'कनकधारा स्तोत्र' की रचना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उस घर में सोने के आंवलों की वर्षा कर दी। तभी से इसे 'कनकधारा' (सोने की धारा) के नाम से जाना जाता है।
कनकधारा स्तोत्र का पाठ कैसे करें? (विधि)
किसी भी मंत्र का पूर्ण लाभ तभी मिलता है जब उसे सही विधि और नियम से किया जाए:
- समय: इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए शुक्रवार का दिन या पूर्णिमा का दिन सबसे उत्तम माना जाता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
- स्थान: अपने घर के पूजा मंदिर में माता लक्ष्मी और श्री गणेश की प्रतिमा के सामने बैठें। यदि आपके पास कनकधारा यंत्र है, तो उसे स्थापित करना अत्यंत फलदायी होता है।
- सामग्री: माता लक्ष्मी को कमल का फूल, लाल चंदन, अक्षत और धूप-दीप अर्पित करें।
- पाठ: शुद्ध उच्चारण के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें। यदि आप संस्कृत में नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अनुवाद भी भावपूर्वक पढ़ सकते हैं।
- नियमितता: इसे प्रतिदिन एक बार या कम से कम प्रत्येक शुक्रवार को 11 बार अवश्य पढ़ें।
कनकधारा स्तोत्र के पाठ से होने वाले लाभ
इस दिव्य स्तोत्र के लाभ अनगिनत हैं, जिनमें से कुछ मुख्य नीचे दिए गए हैं:
- ऋण मुक्ति: यदि आप पुराने कर्ज से परेशान हैं, तो कनकधारा स्तोत्र का पाठ मार्ग प्रशस्त करता है।
- व्यापार में उन्नति: जो लोग व्यापार में घाटा झेल रहे हैं, उनके लिए यह स्तोत्र सौभाग्य लेकर आता है।
- रुका हुआ धन: फंसा हुआ पैसा वापस मिलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
- मानसिक शांति: लक्ष्मी जी की कृपा से न केवल धन आता है, बल्कि घर का कलह भी समाप्त होता है।
कनकधारा स्तोत्र: मुख्य पंक्तियाँ
इसका प्रभाव शब्दों की शक्ति में छिपा है। इसकी शुरुआत इन पंक्तियों से होती है:
"अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।"
अर्थात, जैसे भ्रमरी (मक्खी) अधखिले फूलों वाले तमाल के वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही श्री हरि के रोमांच से सुशोभित अंगों पर आश्रित रहने वाली लक्ष्मी जी की दृष्टि हम पर मंगल बरसाए।
निष्कर्ष
गरीबी और दरिद्रता को दूर करने के लिए केवल कर्म ही नहीं, बल्कि ईश्वरीय कृपा की भी आवश्यकता होती है। कनकधारा स्तोत्र वह माध्यम है जो हमारे कर्मों के अवरोधों को हटाकर समृद्धि के द्वार खोलता है। याद रखें, माता लक्ष्मी उसी पर प्रसन्न होती हैं जहाँ स्वच्छता, परिश्रम और श्रद्धा का मेल होता है।
श्री कनकधारा स्तोत्र का पूर्ण संस्कृत पाठ और उसका हिंदी अनुवाद
॥ श्री कनकधारा स्तोत्रम् ॥
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १ ॥
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतमागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥ २ ॥
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धमिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ३ ॥
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकापक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ४ ॥
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ५ ॥
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ६ ॥
प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावात् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदमिमन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ७ ॥
दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारामस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ८ ॥
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्रदृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं भजन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ९ ॥
गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्म्यै ॥ १० ॥
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११ ॥
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२ ॥
नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै ।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १३ ॥
नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ १४ ॥
नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५ ॥
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १६ ॥
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
सन्तनोति वचनाङ्गमनसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७ ॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १८ ॥
दिग्धस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्टस्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेषलोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १९ ॥
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ २० ॥
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभाजिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ २१ ॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
कनकधारा स्तोत्र का सरल हिंदी भावार्थ
कनकधारा स्तोत्र के 21 श्लोकों में आदि गुरु शंकराचार्य ने माता लक्ष्मी के सौंदर्य, उनकी दयालुता और उनकी शक्ति का अद्भुत वर्णन किया है। यहाँ इसका संक्षिप्त भावार्थ दिया गया है:
- प्रथम श्लोक से पांचवें श्लोक तक: इन श्लोकों में शंकराचार्य जी प्रार्थना करते हैं कि जिस प्रकार भ्रमरी फूलों की कली पर मँडराती है, उसी प्रकार माता लक्ष्मी की दया दृष्टि भगवान विष्णु के नीलकमल के समान सुंदर मुख पर स्थिर रहती है। वे प्रार्थना करते हैं कि माता लक्ष्मी की वही चंचल और करुणामयी दृष्टि एक बार मेरी ओर भी मुड़ जाए, जिससे मेरे जीवन के सभी अमंगल दूर हो जाएं।
- छठे से दसवें श्लोक तक: यहाँ माता लक्ष्मी को 'भृगुनंदना' और 'सागर पुत्री' कहकर संबोधित किया गया है। कवि कहते हैं कि माता लक्ष्मी की कृपा दृष्टि मात्र से ही इंद्र को स्वर्ग का साम्राज्य प्राप्त हुआ था। यदि उनकी कृपा का एक अंश भी मुझ जैसे निर्धन पर पड़ जाए, तो मेरे प्रारब्ध के सभी पाप और दरिद्रता क्षण भर में नष्ट हो जाएंगे।
- ग्यारहवें से पंद्रहवें श्लोक तक (वंदना): इन श्लोकों में माता लक्ष्मी के विभिन्न रूपों को नमन किया गया है:
- ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के रूप में आपको नमस्कार है।
- शाकम्भरी और दुर्गा के रूप में आपको नमस्कार है।
- भगवान नारायण की प्रियतमा और कमल के आसन पर विराजमान देवी को बार-बार नमस्कार है। इन मंत्रों में 'नमोऽस्तु' (आपको नमस्कार है) की आवृत्ति से माता के प्रति पूर्ण समर्पण भाव झलकता है।
- सोलहवें से बीसवें श्लोक तक: शंकराचार्य जी कहते हैं कि हे माता! आपकी आराधना समस्त इंद्रियों को सुख देने वाली और साम्राज्य प्रदान करने वाली है। मैं आपकी शरण में हूँ। जिस प्रकार हाथियों द्वारा स्वर्ण कलशों से गंगाजल गिराकर आपका अभिषेक किया जाता है, उसी प्रकार आप अपनी करुणा की वर्षा मुझ पर करें। मैं निर्धनों में अग्रगण्य (सबसे प्रथम) हूँ, इसलिए मैं आपकी दया का सबसे योग्य पात्र हूँ।
- इक्कीसवां श्लोक (उपसंहार): अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो मनुष्य प्रतिदिन वेदों की माता और त्रिभुवन की जननी माँ रमा (लक्ष्मी) की इस स्तुति से उपासना करता है, वह इस लोक में महान भाग्यशाली बनता है और विद्वान लोग भी उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं।
पाठकों के लिए एक विशेष टिप
यदि आप आर्थिक तंगी से बहुत अधिक परेशान हैं, तो इस स्तोत्र का पाठ करते समय मन में "सोने की वर्षा" का ध्यान करें, जैसा कि आदि गुरु शंकराचार्य के समय हुआ था। संकल्प और विश्वास ही मंत्र की शक्ति को जागृत करते हैं।
पाठ का फल (Phalshruti)
इस स्तोत्र के अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन माता लक्ष्मी की इस स्तुति का गान करता है, वह इस संसार में कुबेर के समान ऐश्वर्य प्राप्त करता है। उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है और उसके घर में कभी दरिद्रता प्रवेश नहीं करती।
कनकधारा स्तोत्र: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. कनकधारा स्तोत्र का पाठ किस दिन से शुरू करना चाहिए?
कनकधारा स्तोत्र का पाठ शुरू करने के लिए शुक्रवार का दिन सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि यह दिन माता लक्ष्मी को समर्पित है। इसके अलावा दीपावली, धनतेरस या किसी भी पूर्णिमा से इसे शुरू किया जा सकता है।
2. क्या महिलाएं कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?
जी हाँ, कोई भी पुरुष या महिला पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
3. क्या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने के लिए कनकधारा यंत्र का होना अनिवार्य है?
अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि आप कनकधारा यंत्र के सामने घी का दीपक जलाकर पाठ करते हैं, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। यदि यंत्र न हो, तो माता लक्ष्मी के चित्र के सामने भी पाठ किया जा सकता है।
4. इस स्तोत्र का पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए?
नियमित रूप से दिन में एक बार पाठ करना पर्याप्त है। हालांकि, विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए इसे प्रतिदिन 3 बार या शुक्रवार के दिन 11 बार पढ़ना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
5. क्या संस्कृत नहीं आने पर हिंदी अनुवाद पढ़ सकते हैं?
हाँ, यदि आप संस्कृत के कठिन शब्दों का उच्चारण नहीं कर पा रहे हैं, तो आप भावपूर्वक इसका हिंदी भावार्थ भी पढ़ सकते हैं। माता लक्ष्मी भाव की भूखी हैं, भाषा की नहीं।
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