योगिनी एकादशी व्रत कथा: इस दुर्लभ कथा को पढ़ने से मिलते हैं 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य!

भगवान श्री विष्णु और ऋषि मार्कण्डेय से आशीर्वाद लेते हुए कोढ़ी हेममाली यक्ष की योगिनी एकादशी व्रत कथा का चित्रण।
Yogini Ekadashi Vrat Katha & Mahatva in Hindi: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे अपरा एकादशी (Apra Ekadashi) के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन विधि-विधान से व्रत रखता है और इसकी दुर्लभ कथा सुनता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सीधे स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।

​आइए जानते हैं भगवान श्री कृष्ण द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई गई योगिनी एकादशी की वह पौराणिक और दुर्लभ कथा, जिसके साक्षी स्वयं पुराण भी हैं।

​योगिनी (अपरा) एकादशी का महत्व (Mahatva)

​सनातन धर्म में योगिनी एकादशी का विशेष महत्व है। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार:

  • ​यह एकादशी तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
  • ​इस व्रत को करने से मनुष्य को इस लोक में दिव्य भोग और परलोक में मुक्ति मिलती है।
  • सबसे बड़ा पुण्य: इस कथा को पढ़ने या सुनने का फल 88,000 (अट्ठासी सहस्त्र) ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर माना गया है।

योगिनी एकादशी व्रत की दुर्लभ कथा (Yogini Ekadashi Vrat Katha)

​1. कुबेर देव की पूजा और हेममाली की भूल

​पौराणिक काल में अलकापुरी नाम की एक बेहद खूबसूरत नगरी थी, जहाँ राजा कुबेर राज करते थे। कुबेर देव भगवान शिव के परम भक्त थे। उनकी दैनिक पूजा के लिए हेममाली नाम का एक यक्ष माली रोज मानसरोवर से सुंदर पुष्प (फूल) लाया करता था।

​हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षा था, जो अत्यंत रूपवान थी। एक दिन हेममाली मानसरोवर से पुष्प तो ले आया, लेकिन अपनी पत्नी के प्रति कामासक्त होने के कारण वह घर पर ही रुक गया और दोपहर तक राजा कुबेर के पास नहीं पहुँचा।

​2. राजा कुबेर का भयंकर क्रोध और श्राप

​जब दोपहर तक फूल नहीं पहुँचे, तो राजा कुबेर ने क्रोध में आकर अपने सेवकों को हेममाली का पता लगाने भेजा। सेवकों ने आकर बताया, "हे राजन! हेममाली इस समय अपनी पत्नी के साथ रमण कर रहा है।"

​यह सुनकर कुबेर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने तुरंत हेममाली को दरबार में हाजिर होने का आदेश दिया। भय से काँपते हुए हेममाली ने राजा को प्रणाम किया। कुबेर ने गरजते हुए कहा:

​"हे पापी! कामुक नीच! तूने मेरे आराध्य, ईश्वरों के ईश्वर भगवान सदाशिव का अनादर किया है। मैं तुझे श्राप देता हूँ कि तू तुरंत अपनी स्त्री का वियोग भोगेगा और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर कोढ़ी (Leprosy रोगी) बनेगा।"

​3. पृथ्वी लोक पर हेममाली के कष्ट और ऋषि मार्कण्डेय से भेंट

​कुबेर के श्राप के प्रभाव से हेममाली उसी क्षण स्वर्ग से सीधे पृथ्वी पर आ गिरा और भयंकर कोढ़ रोग से ग्रस्त हो गया। उसकी पत्नी भी गायब हो गई। पृथ्वी पर उसने कई वर्षों तक भूख, प्यास और बीमारी के असहनीय कष्ट भोगे। लेकिन शिव भक्ति के प्रभाव से उसकी बुद्धि नष्ट नहीं हुई थी।

​कष्टों को सहते हुए वह एक दिन हिमालय पर्वत पर स्थित मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँचा। ऋषि मार्कण्डेय अत्यंत वृद्ध और परम तपस्वी थे। हेममाली ने ऋषि के चरणों में गिरकर उन्हें प्रणाम किया।

ऋषि मार्कण्डेय अपने आश्रम में शिष्यों और हेममाली को धर्म का मार्ग और योगिनी एकादशी व्रत का विधान समझाते हुए।
​4. ऋषि मार्कण्डेय ने बताया उद्धार का अचूक उपाय

​हेममाली की दयनीय स्थिति देखकर मार्कण्डेय ऋषि ने पूछा, "पुत्र! तूने ऐसा कौन सा पाप कर्म किया है, जिससे तेरी यह दुर्दशा हुई है?"

​हेममाली ने बिना कुछ छुपाए पूरी सत्यता के साथ अपनी भूल और कुबेर देव के श्राप की बात ऋषि को बता दी। हेममाली के सत्य वचन सुनकर ऋषि मार्कण्डेय प्रसन्न हुए और बोले:

​"हेममाली! तुमने मेरे सामने सत्य बोला है, इसलिए मैं तुम्हारे उद्धार का उपाय बताता हूँ। यदि तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी (अपरा एकादशी) का विधि-पूर्वक व्रत रखोगे, तो तुम्हारे सभी पाप भस्म हो जाएंगे।"

​5. व्रत का प्रभाव और पुरानी स्थिति की प्राप्ति

​ऋषि के वचनों पर विश्वास करके हेममाली ने पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से योगिनी एकादशी का व्रत रखा। इस महाव्रत के प्रभाव से उसका कोढ़ पूरी तरह ठीक हो गया, और वह वापस अपने दिव्य रूप में आ गया। इसके बाद वह स्वर्ग लोक लौट गया और अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

निष्कर्ष (Conclusion)

​योगिनी या अपरा एकादशी का व्रत इंसानी जीवन के बड़े से बड़े संकटों और पापों का नाश करने वाला है। यदि आपसे भी जाने-अनजाने में कोई भूल हुई है, तो इस एकादशी का व्रत और कथा श्रवण आपके दुखों को दूर कर सकता है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

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