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होई की असली कहानी | अहोई अष्टमी की सच्ची कहानी | स्याऊ माता की सच्ची कहानी | बिन्दायकजी की कहानी

अहोई अष्टमी की दुर्लभ कथा एक साहूकार का सात बेटा, सात बहुवां और एक बेटी थी। एक दिन सातू बहूवां और बेटी खन्द माटी ल्या न गई। माटी खोद न क समय नणद क हाथ स स्याऊ का बच्चा मरगा। स्याऊ माता बोली की अब म तेरी  कूख  बांदूगी। नणद आपकी सारी भाभियां न कयो कि मे र बद ल कूख बंधवाल्यो। छ भाभियां तो नटगी, पर छोटी भाभी थी, जिकी सोची कि नहीं बंधवागां तो सासुजी नाराज हो जासी, सो बा आपकी कृख बंधवाली दिक टाबर होता और होई सा त क दिन मर जाता।  एक दिन वा पण्डितां न बुला कर पुछ्यो कि यो के दोष ह, मे र टावर होतां ही मर जा व पण्डित बोल्या कि तूं सुरही गाय की सेवा किया कर, बा स्याऊ माता की भावली ह, जिको तेरी कूख छुड़वा देसी, जद ही तेरा टावर जीसी वा खूब सुदियां उठ कर सुरही गाय को सारो काम कर क आ जाती। एक दिन गऊ माता सोची कि आजकल कुण मेरो इतनो काम कर ह, बहूवां तो लड़ाई करती रहती थी। आज देखनो चाहिये कि कुनसी काम कर ह। गऊ माता खूब सुदियां उठ कर बैठगी, देख तो साहूकार क बेटा की बहू सारी काम कर ह। गऊ माता पूछी कि त न के चाहिये ह, सो मेरो इतनो काम कर ह वा बोली की मन बाचा दे, गऊ माता ऊन बाचा दे दिया। बहू बोल

Swami Parmanand Giri Ji Maharaj- Motivational Speech Part 5

Swami Parmanand Giri Ji Maharaj- Motivational Speech Part 5

प्रिय मित्रों आज हम आप सभी के समक्ष परम पूज्य महामंडलेश्वर युगपुरुष स्वामी श्री परमानंद गिरि जी महाराज के द्वारा दिए गए बहराइच समागम के पांचवें प्रवचन के कुछ अंश लेकर प्रस्तुत हुए हैं जिसमें महाराज श्री हम सभी को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि अंधेरा प्रकाश से ही जाता है अर्थात अगर अंधेरे को हटाना है तो हमें प्रकाश करना पड़ेगा परंतु उस प्रकाश को करने के लिए हमें कौन-कौन से कार्य करने पड़ेंगे जिससे हमेशा के लिए एक शाश्वत प्रकाश हमारे मार्ग को प्रकाशित करता रहे।
स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज अपने इस प्रवचन के माध्यम से हम सभी को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य को जो भी कष्ट, जो भी पीड़ा होती है वह केवल इस शरीर के होने की वजह से है। अगर शरीर ना होता तो हमें कोई पीड़ा भी ना होती। 
जब तक शरीर है तब तक पीड़ा है जब शरीर ना होगा तो हमें पूर्ण आनंद होगा अर्थात हमें कभी भी मृत्यु से डरना नहीं चाहिए क्योंकि मृत्यु परमानंद तक प्राणी को पहुंचाती है अर्थात परमेश्वर में विलीन करके हमें ईश्वर के तत्व में समाहित कर जाती है। 
वेदांत वचनो के प्रकांड विद्वान महाराज श्री के अमृत वाणी से हम सभी के अंतर्मन में उठ रहे अनेको द्वंदों का छेदन होता रहा है और आज भी महाराज श्री यही करने का प्रयास कर रहे हैं। 
हमें पूर्ण आशा है कि उनके अमृत वचनों को सुनकर आप सभी के मन अर्थात हृदय के तमाम संशयो के जाल टूट चुके होंगे और आप सब परमानन्द जी महाराज के बताए हुए मार्ग पर निर्भय होकर चल सकेंगे। 
स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज हम सभी को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि अगर किसी से प्रेम करना है तो उससे करना चाहिए जो शाश्वत है, जो नित्य है, जो सदा से है और सदा रहेगा परंतु मनुष्य प्रेम ही संसार के प्राणियों से करता है जो कि नश्वर हैं। 
जब नश्वर से प्रेम करोगे तो कष्ट और दुख ही मिलेगा। स्वामी जी ने मीराबाई के भजन कि कुछ लाइनों के माध्यम से हम सभी को समझाने का प्रयास किया कि मीरा बाई कहती थी कि "ऐसे वर को क्या वरु जो जन्मे और मर जाये। " 
श्री राम जय राम जय जय राम 
श्री राम जय राम जय जय राम

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